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सुप्रीम कोर्ट ने सजा बरकरार रखते हुए आरोपियों को दी राहत, प्रोबेशन का लाभ देकर जेल से बचाया

सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए आरोपियों को प्रोबेशन का लाभ दिया, कहा कि सुधारात्मक न्याय प्रणाली में सजा से ज्यादा पुनर्वास जरूरी है। - मिलिंद पुत्र अश्रुबा धनवे और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने सजा बरकरार रखते हुए आरोपियों को दी राहत, प्रोबेशन का लाभ देकर जेल से बचाया

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दोषसिद्धि को कायम रखते हुए आरोपियों को जेल भेजने के बजाय सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाया। अदालत ने कहा कि जहां संभव हो, कानून का उद्देश्य सजा देना नहीं बल्कि सुधार करना होना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला 2019 का है, जब एक 17 वर्षीय लड़की के साथ छेड़छाड़ और उसके परिवार पर हमले का आरोप लगा। अभियोजन के अनुसार, आरोपियों ने पहले लड़की को जबरन विवाह का प्रस्ताव दिया और विरोध करने पर उसके परिवार के सदस्यों पर हमला किया।

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ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 323 (मारपीट) और 324 (खतरनाक हथियार से चोट) के तहत दोषी ठहराया, लेकिन उन्हें केवल जुर्माने की सजा दी। हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 एक सुधारात्मक कानून है, जिसका उद्देश्य अपराधियों को समाज में दोबारा स्थापित करना है।

अदालत ने कहा,

“अपराधी को सजा देने से अधिक जरूरी है उसे सुधार कर समाज का उपयोगी सदस्य बनाना।”

कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि केवल जुर्माना होने की स्थिति में भी प्रोबेशन का लाभ दिया जा सकता है। राज्य की इस दलील को खारिज कर दिया गया कि बिना जेल की सजा के प्रोबेशन लागू नहीं होता।

अदालत ने विस्तार से समझाया कि:

  • “सजा” में केवल जेल ही नहीं, बल्कि जुर्माना भी शामिल है।
  • इसलिए, ऐसे मामलों में भी प्रोबेशन लागू हो सकता है जहां आरोपी को सिर्फ फाइन दिया गया हो।
  • अदालत को यह देखना चाहिए कि क्या आरोपी को सुधारने का अवसर देना “उचित” (expedient) है।

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कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपियों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था और घटना स्थानीय विवाद से जुड़ी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने:

  • A-1, A-2 और A-3 को दोषी ठहराने का फैसला बरकरार रखते हुए उन्हें एक वर्ष के लिए प्रोबेशन पर रिहा करने का निर्देश दिया।
  • A-4 को धारा 323 के तहत दोषी मानते हुए सिर्फ चेतावनी (admonition) देकर छोड़ दिया गया।
  • सभी आरोपियों को जुर्माना जमा करने का निर्देश दिया गया, जिसे पीड़ित को मुआवजा माना जाएगा।
  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रोबेशन का लाभ मिलने पर आरोपियों पर सेवा से संबंधित कोई अयोग्यता लागू नहीं होगी।

Case Details

Case Title: Milind S/o Ashruba Dhanve & Ors. vs State of Maharashtra


Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 6843 of 2024


Judges: Justice J.K. Maheshwari and Justice Atul S. Chandurkar


Decision Date: April 10, 2026

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