मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

सिर्फ कीमती सामान की मांग से नहीं बनेगा अपराध - दहेज मृत्यु साबित के लिए उत्पीड़न का प्रमाण अनिवार्य: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दहेज मृत्यु मामले में तीन आरोपियों को बरी किया। कोर्ट ने कहा कि मौत असामान्य साबित नहीं हुई और दहेज उत्पीड़न के ठोस सबूत नहीं मिले। - जस्टिस मनीष माथुर

Shivam Y.
सिर्फ कीमती सामान की मांग से नहीं बनेगा अपराध - दहेज मृत्यु साबित के लिए उत्पीड़न का प्रमाण अनिवार्य: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक पुराने दहेज मृत्यु मामले में ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि आदेश को पलटते हुए तीनों अभियुक्तों को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि मृतका की मौत असामान्य परिस्थितियों में हुई थी या उसके साथ दहेज के कारण क्रूरता की गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला एक विवाहिता की मृत्यु से जुड़ा था, जिसकी शादी 1995 में हुई थी। 1999 में उसकी मृत्यु ससुराल में हुई। पिता ने आरोप लगाया कि दहेज की मांग पूरी न होने पर बेटी को जहर देकर मारा गया।

ट्रायल कोर्ट ने 2004 में अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए उन्हें सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की गई थी।

Read also:- गलत ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्रों के कारण उम्मीदवारों को उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य कार्यकर्ता के पदों से वंचित होना पड़ा- सुप्रीम कोर्ट

अभियुक्त पक्ष का तर्क था कि:

मृतका के शरीर पर कोई चोट या जलने का निशान नहीं था।

पोस्टमार्टम और विसरा रिपोर्ट में जहर नहीं मिला।

मौत का कारण स्पष्ट नहीं हुआ।

इसलिए दहेज मृत्यु का अपराध नहीं बनता।

राज्य पक्ष ने कहा कि मृतका ने मृत्यु से कुछ दिन पहले मायके वालों से दहेज के लिए प्रताड़ना की बात कही थी। इसलिए यह दहेज मृत्यु का मामला है।

Read also:- सहकर्मी की छाती को घूरना अनुचित हो सकता है, लेकिन आईपीसी की धारा 354-सी के तहत अपराध नहीं: बॉम्बे हाई कोर्ट ने FIR रद्द की

जस्टिस मनीष माथुर ने कहा:

“धारा 304-B लागू करने के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि महिला की मृत्यु असामान्य परिस्थितियों में हुई और उससे पहले दहेज को लेकर प्रताड़ना की गई।”

कोर्ट ने पाया:

पोस्टमार्टम में न चोट मिली न जहर।

मौत का कारण अज्ञात रहा।

गवाहों के बयान अस्पष्ट थे।

Read also:- राणा अय्यूब ट्वीट विवाद: दिल्ली हाईकोर्ट में X की जवाबदेही पर सवाल, सेफ हार्बर पर संकट

“सिर्फ सात साल के भीतर मौत होना या सामान्य आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है,” कोर्ट ने टिप्पणी की।

हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन धारा 304-B और 498-A IPC के आवश्यक तत्व सिद्ध करने में विफल रहा।

तीनों अभियुक्तों को बरी कर दिया गया।उनके जमानत बांड रद्द कर दिए गए और ज़मानतदार मुक्त किए गए। अदालत ने निर्देश दिया कि वे कानून के तहत आवश्यक बांड जमा करें।

Case Details

Case Title: Mewa Lal And 2 Ors. vs State of U.P.

Case Number: Criminal Appeal No. 2148 of 2004

Judge: Justice Manish Mathur

Decision Date: 31 March 2026

Download Order

Mobile App

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Install App
CourtBook Mobile App

More Stories