एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वाद (plaint) में संशोधन की अनुमति देते समय अदालत को मामले के गुण-दोष (merits) में नहीं जाना चाहिए। अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए अपीलीय अदालत द्वारा दिए गए संशोधन की अनुमति को बहाल कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला एक किरायेदारी विवाद से जुड़ा है, जिसमें मकान मालिक ने वर्ष 2005 में किरायेदार के खिलाफ बेदखली (eviction) का मुकदमा दायर किया था। उन्होंने दावा किया था कि उन्हें अपने और परिवार के उपयोग के लिए दुकान की आवश्यकता है।
ट्रायल कोर्ट ने 2016 में यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया कि मकान मालिक अपनी वास्तविक जरूरत साबित नहीं कर सके। इसके खिलाफ अपील दायर की गई।
अपील के दौरान मकान मालिक का निधन हो गया, जिसके बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारी (legal heirs) को मामले में शामिल किया गया। उन्होंने वाद में संशोधन का आवेदन देकर अपनी नई आवश्यकताओं जैसे वकील पत्नी का कार्यालय और बेटे की मेडिकल प्रैक्टिस का उल्लेख किया।
स्मॉल कॉजेज कोर्ट की अपीलीय पीठ ने संशोधन की अनुमति देते हुए कहा कि:
- मूल वाद में परिवार की जरूरत पहले से शामिल थी
- संशोधन से कोई नया या विरोधाभासी मामला नहीं बन रहा
- इससे अनावश्यक नए मुकदमे से बचा जा सकता है
इसलिए अदालत ने ₹15,000 लागत के साथ संशोधन की अनुमति दी और मामले को ट्रायल कोर्ट में साक्ष्य के लिए भेजा।
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि:
- मूल मकान मालिक ने अपने परिवार की जरूरत स्पष्ट रूप से साबित नहीं की थी
- संशोधन से पूरी तरह नया मामला सामने आ रहा है
- कानूनी उत्तराधिकारी नया मुकदमा दायर कर सकते हैं
इस आधार पर हाईकोर्ट ने संशोधन की अनुमति को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण को गलत बताया। अदालत ने कहा:
“संशोधन की अनुमति पर विचार करते समय अदालत को मामले के मेरिट में नहीं जाना चाहिए।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:
- मूल वाद में “परिवार की आवश्यकता” पहले से दर्ज थी
- हाईकोर्ट ने इस तथ्य को नजरअंदाज किया
- अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट को केवल प्रक्रिया की वैधता देखनी चाहिए, न कि साक्ष्य या मेरिट का पुनर्मूल्यांकन
अदालत ने यह भी कहा कि बाद की घटनाओं (subsequent events) को न्याय के हित में ध्यान में रखा जा सकता है, खासकर जब वे राहत पर प्रभाव डालती हों।
सुप्रीम कोर्ट ने:
- हाईकोर्ट का 7 अगस्त 2024 का आदेश रद्द कर दिया
- अपीलीय अदालत द्वारा दिया गया संशोधन आदेश बहाल कर दिया
- पक्षकारों को ट्रायल कोर्ट के समक्ष आगे की कार्यवाही के लिए उपस्थित होने का निर्देश दिया
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की है और ट्रायल कोर्ट स्वतंत्र रूप से निर्णय लेगा।
Case Details
Case Title: Vinay Raghunath Deshmukh v. Natwarlal Shamji Gada & Anr.
Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 8991 of 2025
Judges: Justice J.K. Maheshwari & Justice Atul S. Chandurkar
Decision Date: April 24, 2026










