नई दिल्ली में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले से जुड़े एक पुराने भूमि विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक उपयोग की जमीन को प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए निजी स्वामित्व में नहीं बदला जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बाबू सिंह बनाम कंसोलिडेशन अधिकारी से जुड़ा है, जिसमें विवादित भूमि पहले राजस्व रिकॉर्ड में ‘कैटेगरी-6’ के तहत दर्ज थी। इसका मतलब है कि यह जमीन गैर-कृषि उपयोग, जैसे कि बंजर भूमि, रास्ते, या सार्वजनिक उपयोग के लिए थी।
1992 में स्थानीय अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर इस जमीन को ‘कैटेगरी-5’ (कृषि योग्य भूमि) में बदल दिया गया और इसके बाद कई लोगों को पट्टे दे दिए गए। अपीलकर्ता बाबू सिंह को भी इसी आधार पर भूमि का अधिकार मिला और उनका नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हुआ।
बाद में, जब गांव में भूमि समेकन (कंसोलिडेशन) की प्रक्रिया शुरू हुई, तो इस जमीन की प्रकृति पर सवाल उठे।
सुनवाई के दौरान पीठ ने पाया कि यह जमीन वास्तव में ‘खलिहान’ और ‘चरागाह’ जैसी सार्वजनिक उपयोग की श्रेणी में आती है, जो कानून के तहत संरक्षित होती है।
“अदालत ने कहा कि सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर भूमिधर अधिकार कानूनन नहीं दिए जा सकते।”
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उप-जिलाधिकारी (SDO) को भूमि की श्रेणी बदलने का अधिकार नहीं था। अदालत के अनुसार, राजस्व मैनुअल के नियम केवल रिकॉर्ड में प्रविष्टि बदलने की अनुमति देते हैं, जमीन की प्रकृति बदलने की नहीं।
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पीठ ने कहा,
“कानून जो सीधे तौर पर मना करता है, उसे प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से अनुमति नहीं दी जा सकती।”
अदालत ने उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम की धारा 132 का हवाला देते हुए कहा कि सार्वजनिक उपयोग की जमीन पर भूमिधर अधिकार नहीं दिए जा सकते।
यह भी बताया गया कि अगर कोई पट्टा दिया भी गया हो, तो वह अधिकतम 5 साल के असामी पट्टे के रूप में ही मान्य हो सकता है, जो अब समाप्त हो चुका है।
साथ ही, अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि पहले की कार्यवाही के कारण यह मामला दोबारा नहीं उठाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि पहले के मामलों में पट्टे की वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ था।
सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।
अदालत ने कहा कि भूमि की श्रेणी बदलने की प्रक्रिया अवैध थी और उसी आधार पर दिए गए पट्टे भी शुरुआत से ही शून्य (void) माने जाएंगे।
अंततः कोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए कहा कि इसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई और मामले में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।
Case Details:
Case Title: Babu Singh vs Consolidation Officer & Others
Case Number: Civil Appeal No. 4633 of 2026
Judge: Justice Prashant Kumar Mishra, Justice N.V. Anjaria
Decision Date: 21 April 2026











