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1994 हत्या केस में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: इलाहाबाद हाईकोर्ट से तीन आपराधिक रिविजन केस अपने पास मंगाए

जयदीप कुमार श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य - सुप्रीम कोर्ट ने 1994 के एक हत्या मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय से तीन आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाएं वापस ले लीं, जिसमें देरी और त्वरित सुनवाई के अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव का हवाला दिया गया।

Shivam Y.
1994 हत्या केस में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: इलाहाबाद हाईकोर्ट से तीन आपराधिक रिविजन केस अपने पास मंगाए

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में लगभग तीन दशक पुराने हत्या मामले में न्यायिक देरी पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने पाया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित तीन आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं पर 2020 से फैसला सुरक्षित होने के बावजूद अभी तक निर्णय नहीं दिया गया है, जिससे पूरा आपराधिक मुकदमा ठप पड़ा हुआ है।

इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 139A के तहत इन मामलों को अपने पास स्थानांतरित करने का आदेश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता जयदीप कुमार श्रीवास्तव ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया कि वह 1994 की एक हिंसक घटना में मारे गए व्यक्ति के कानूनी उत्तराधिकारी हैं।

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30 मई 1994 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के चरखी थाना क्षेत्र में दर्ज केस क्राइम नंबर 68/1994 में भारतीय दंड संहिता की धाराएँ 147, 148, 149, 302 और 307 के तहत मामला दर्ज हुआ था। इस घटना में दो लोगों की मौत हुई और कई अन्य घायल हुए।

मामले में नौ आरोपियों के खिलाफ 1995 में सत्र न्यायालय में मुकदमा शुरू हुआ, जबकि एक अन्य आरोपी के खिलाफ 2004 में अलग सत्र ट्रायल शुरू किया गया। बाद में दोनों मामलों की सुनवाई एक साथ की जाने लगी।

मुकदमे के दौरान 2008 में राज्य सरकार ने एक आरोपी छोटे सिंह के खिलाफ अभियोजन वापस लेने का प्रस्ताव जारी किया। इसके बाद 2012 में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत अभियोजन वापसी की अर्जी दाखिल की गई।

ट्रायल कोर्ट ने 19 मई 2012 को आदेश पारित करते हुए छोटे सिंह के खिलाफ अभियोजन वापसी की अनुमति दे दी, लेकिन अन्य आरोपियों के मामले में यह मांग खारिज कर दी।

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इस आदेश के खिलाफ बाकी आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में तीन आपराधिक रिविजन याचिकाएँ दाखिल कीं। इन्हें 5 फरवरी 2020 को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामान्यतः वह हाईकोर्ट में लंबित मामलों की सूची या सुनवाई को लेकर दखल नहीं देता।

पीठ ने स्पष्ट किया,

“सुप्रीम कोर्ट का असाधारण अधिकार क्षेत्र बहुत सावधानी से इस्तेमाल किया जाना चाहिए, क्योंकि यह अदालत हर हाईकोर्ट के रोजमर्रा के न्यायिक प्रशासन की निगरानी करने के लिए नहीं है।”

हालांकि अदालत ने यह भी माना कि यहां लंबित मामलों की वजह से तेजी से न्याय पाने के अधिकार पर असर पड़ा है और आपराधिक मुकदमा दशकों से अटका हुआ है।

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पीठ ने कहा कि जब कोई मामला सुना जा चुका हो और वर्षों तक फैसला न आए, तो यह न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।

अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों में संविधान का अनुच्छेद 139A लागू किया जा सकता है ताकि महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों का प्रभावी और समयबद्ध समाधान हो सके।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि:

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित क्रिमिनल रिविजन नंबर 1678/2012, 1874/2012 और 1900/2012 को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित किया जाए।
  • हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल तीन सप्ताह के भीतर इन मामलों का पूरा रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट को भेजें।
  • यदि सत्र ट्रायल का मूल रिकॉर्ड हाईकोर्ट में है तो उसे भी तीन सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट को वापस भेजा जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि रिकॉर्ड प्राप्त होने के बाद मामले को मुख्य न्यायाधीश के आदेश से उचित पीठ के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।

Case Title:- Jaideep Kumar Srivastava v. State of Uttar Pradesh & Others

Case Number:- Writ Petition (Criminal) No. 56 of 2026

Date of Order:- 13 February 2026

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