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सुप्रीम कोर्ट ने 17 साल बाद मिली वसीयत पर मिला प्रोबेट रद्द किया, कहा- जरूरी पक्षों को नोटिस नहीं दिया गया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जरूरी पक्षों को नोटिस दिए बिना और अहम तथ्य छिपाकर लिया गया प्रोबेट टिक नहीं सकता। हाईकोर्ट का आदेश रद्द। - एस. लियोरेक्स सेबेस्टियन और अन्य बनाम सरोजिनी और अन्य।

Rajan Prajapati
सुप्रीम कोर्ट ने 17 साल बाद मिली वसीयत पर मिला प्रोबेट रद्द किया, कहा- जरूरी पक्षों को नोटिस नहीं दिया गया

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में मद्रास हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा कि वसीयत के आधार पर लिया गया प्रोबेट (अदालती प्रमाणन) तब कायम नहीं रह सकता, जब जरूरी पक्षों को नोटिस ही न दिया गया हो और अदालत से महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए हों। कोर्ट ने जिला अदालत द्वारा प्रोबेट रद्द करने के आदेश को सही ठहराया।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित संपत्तियों से जुड़ा था। प्रतिवादी सरोजिनी ने वर्ष 2009 में दावा किया कि उनके पिता ने 9 जनवरी 1976 को उनके पक्ष में एक बिना रजिस्टर्ड वसीयत बनाई थी। पिता की मृत्यु 1983 में हो चुकी थी।

याचिका में प्रोबेट मांगा गया और जिला अदालत ने 2009 में इसे मंजूर कर दिया। बाद में वर्तमान अपीलकर्ताओं ने अदालत पहुंचकर कहा कि संपत्ति पहले ही बिक्री विलेखों के जरिए अन्य लोगों को बेची जा चुकी थी और उन्हें कभी नोटिस नहीं दिया गया।

जिला अदालत ने 2020 में प्रोबेट रद्द कर दिया। अदालत ने पाया कि वसीयत साबित करने के लिए जरूरी गवाह पेश नहीं किए गए। साथ ही, वसीयत 26 साल तक किसके पास रही, इसका संतोषजनक जवाब भी नहीं दिया गया।

अदालत ने यह भी माना कि मृतक के बेटों या उनके वारिसों को पक्षकार नहीं बनाया गया, जबकि वे जरूरी पक्ष थे।

मद्रास हाईकोर्ट ने जिला अदालत का आदेश पलट दिया था। हाईकोर्ट का कहना था कि प्रोबेट अदालत सिर्फ वसीयत की वैधता देखती है, संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला नहीं करती। इसलिए जिला अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश दिया।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रोबेट आदेश केवल पक्षकारों पर ही नहीं, बल्कि व्यापक रूप से प्रभाव डालता है। इसलिए जिन लोगों का संपत्ति में हित हो सकता है, उन्हें सुनवाई का मौका मिलना चाहिए।

पीठ ने कहा,

“प्रतिवादी ने अपने दो भाइयों/उनके वारिसों और वर्तमान अपीलकर्ताओं को पक्षकार नहीं बनाया तथा महत्वपूर्ण तथ्य दबाए।” कोर्ट ने माना कि ऐसे हालात में प्रोबेट रद्द किया जाना उचित था।

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का 26 अप्रैल 2022 का आदेश रद्द कर दिया और जिला अदालत द्वारा प्रोबेट निरस्त करने का फैसला बहाल कर दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि लंबित दीवानी मुकदमों का निर्णय संबंधित अदालत स्वतंत्र रूप से कानून के अनुसार करेगी।

Case Details:

Case Title: S. Leorex Sebastian & Anr. v. Sarojini & Ors.

Case Number: Special Leave Petition (C) No. 20055 of 2022 (Civil Appeal, 2026)

Court: Supreme Court of India

Judge: Justice Ujjal Bhuyan, Justice Vipul M. Pancholi

Date: April 21, 2026

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