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पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने रिश्वत के कथित मामले में हरियाणा पुलिस के पूर्व अधिकारी की अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज कर दी

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पूर्व पुलिस अधिकारी वीर सैन की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों की प्रभावी जांच के लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक है। - Veer Sain v. State of Haryana

Zaved Khan
 पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने रिश्वत के कथित मामले में हरियाणा पुलिस के पूर्व अधिकारी की अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज कर दी

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में पूर्व हरियाणा पुलिस उप-निरीक्षक (सब-इंस्पेक्टर) वीर सैन को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि एक लोक सेवक पर रिश्वत मांगने जैसे आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और मामले की निष्पक्ष जांच के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ आवश्यक है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 13 अक्टूबर 2025 को दर्ज एफआईआर संख्या 288 से जुड़ा है, जिसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 के तहत थाना सदर बल्लभगढ़, फरीदाबाद में मामला दर्ज किया गया था।

शिकायतकर्ता नरेंद्र सिंह, जो भारतीय सेना से सेवानिवृत्त जूनियर कमीशंड अधिकारी हैं और वाहन मरम्मत कार्यशाला चलाते हैं, ने आरोप लगाया कि मार्च 2022 में दर्ज एक आपराधिक मामले की जांच तत्कालीन सब-इंस्पेक्टर वीर सैन कर रहे थे। शिकायत के अनुसार, 6 अप्रैल 2022 को आरोपी उनकी कार्यशाला पहुंचे, अवैध धनराशि की मांग की, ₹10,000 प्राप्त किए और बाद में ₹20,000 की अतिरिक्त मांग करते हुए कथित रूप से झूठे आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी दी। शिकायतकर्ता ने यह भी दावा किया कि उनकी कार्यशाला में लगे सीसीटीवी कैमरों में यह घटना रिकॉर्ड हुई थी।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि कथित घटना के तीन वर्ष से अधिक समय बाद एफआईआर दर्ज की गई, जिससे शिकायत पर संदेह पैदा होता है। यह भी कहा गया कि पहले हुई विभागीय जांच में रिश्वत के आरोप सिद्ध नहीं पाए गए थे और उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई पहले ही हो चुकी है।

अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति सुमीत गोयल ने कहा कि जिस पुलिस अधिकारी पर किसी आपराधिक मामले की जांच के दौरान अपने पद का दुरुपयोग कर रिश्वत मांगने का आरोप हो, उसके मामले को गंभीरता से देखा जाना चाहिए।

अदालत ने कहा,

"लोक सेवक द्वारा किया गया भ्रष्टाचार केवल किसी एक व्यक्ति के विरुद्ध अपराध नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज के विरुद्ध अपराध है, जो प्रशासन में जनता के विश्वास को कमजोर करता है।"

याचिकाकर्ता की इस दलील को कि रिश्वत मांगने या स्वीकार करने का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, अदालत ने इस स्तर पर स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे प्रश्न साक्ष्यों के मूल्यांकन से जुड़े हैं, जिनका निर्णय मुकदमे के दौरान होगा। अग्रिम जमानत पर विचार करते समय केवल यह देखा जाता है कि प्रथम दृष्टया आरोप संज्ञेय अपराध का संकेत देते हैं या नहीं तथा प्रभावी जांच के लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक है या नहीं।

पीठ ने यह भी नोट किया कि जांच एजेंसी ने अदालत के समक्ष कहा है कि कथित धनराशि के लेनदेन और अन्य तथ्यों की पुष्टि के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट के Devinder Kumar Bansal v. State of Punjab तथा State v. Anil Sharma मामलों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मामलों में अग्रिम जमानत केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दी जानी चाहिए और कई मामलों में प्रभावी जांच के लिए हिरासत में पूछताछ महत्वपूर्ण होती है।

अदालत का फैसला

मामले के आरोपों की गंभीरता, जांच की वर्तमान स्थिति और हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता को देखते हुए हाई कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता अग्रिम जमानत पाने का अधिकार स्थापित नहीं कर सके हैं।

अदालत ने कहा कि इस चरण पर अग्रिम जमानत देने से चल रही जांच प्रभावित हो सकती है। साथ ही, झूठे फंसाए जाने की दलील तथ्यात्मक विवाद का विषय है, जिसका परीक्षण जांच पूरी होने या मुकदमे के दौरान किया जाएगा।

इन्हीं कारणों से हाई कोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत याचिका के निर्णय तक सीमित हैं और इन्हें मामले के गुण-दोष या जांच पर अंतिम राय नहीं माना जाएगा।

Case Details:

Case Title: Veer Sain v. State of Haryana

Case Number: CRM-M-33910-2026

Judge: न्यायमूर्ति सुमीत गोयल

Decision Date: 06 जुलाई 2026

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