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ट्रांसफर विवाद में बैंक कार्यालय पुलिस लाना कदाचार हो सकता है, जांच अधिकारी के निष्कर्ष सही: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाई कोर्ट ने माना कि बैंक कर्मचारी की अनुशासनात्मक जांच के निष्कर्ष सबूतों पर आधारित थे और लेबर कोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें उन निष्कर्षों को गलत या अनुचित बताया गया था। - अभ्युदय को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम स्मिता वीरेंद्र पाटिल

Shivam Y.
ट्रांसफर विवाद में बैंक कार्यालय पुलिस लाना कदाचार हो सकता है, जांच अधिकारी के निष्कर्ष सही: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी कर्मचारी द्वारा अपने तबादले (ट्रांसफर) को लेकर पुलिस से शिकायत करना और पुलिसकर्मियों को बैंक कार्यालय में लाकर अधिकारी से पूछताछ करवाना कदाचार (Misconduct) माना जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि विभागीय जांच अधिकारी की रिपोर्ट को बिना पर्याप्त आधार के “विकृत” (Perverse) नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने ने यह फैसला अभ्युदय को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड द्वारा दायर याचिका पर सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला बैंक की कर्मचारी स्मिता वीरेन्द्र पाटिल से जुड़ा है। बैंक के अनुसार, वर्ष 2012 में उन्हें अकाउंट्स विभाग से वाशी शाखा में स्थानांतरित किया गया था। आरोप था कि ट्रांसफर आदेश मिलने के बाद उन्होंने दो पुलिसकर्मियों को बैंक कार्यालय में लाकर एचआर विभाग के प्रबंधक एच.डी. भाट से अपने तबादले के संबंध में पूछताछ करवाई।

बैंक का यह भी आरोप था कि कर्मचारी ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, बैंकिंग ओम्बड्समैन, महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग, मुख्यमंत्री तथा अन्य कई अधिकारियों को बैंक के खिलाफ शिकायतें भेजीं। बाद में विभागीय जांच में आरोप सिद्ध पाए गए और जनवरी 2015 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

हालांकि, श्रम न्यायालय (लेबर कोर्ट) ने जांच को निष्पक्ष माना, लेकिन जांच अधिकारी के निष्कर्षों को साक्ष्यों के विपरीत बताते हुए उन्हें “परवर्स” करार दिया। औद्योगिक न्यायालय ने भी इस निष्कर्ष को बरकरार रखा।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए कहा कि कर्मचारी ने स्वयं इस तथ्य से इनकार नहीं किया कि वह पुलिसकर्मियों को बैंक लेकर आई थीं।

अदालत ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी को ट्रांसफर से शिकायत है तो उसके लिए संस्थान के भीतर उपलब्ध उपायों का सहारा लिया जाना चाहिए। पुलिस को शामिल करना और बैंक अधिकारी से पूछताछ करवाना सामान्य प्रक्रिया नहीं है।

अदालत ने कहा,

“यदि कर्मचारी अपने तबादले से असंतुष्ट थी, तो उसे बैंक के भीतर उपलब्ध उपायों का उपयोग करना चाहिए था। पुलिस के पास जाकर शिकायत करना और उन्हें बैंक कार्यालय तक लाना अनुचित आचरण माना जा सकता है।”

न्यायालय ने यह भी माना कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि कर्मचारी ने सीधे तौर पर प्रबंधक के साथ दुर्व्यवहार किया था। इसलिए उस विशेष आरोप को सिद्ध नहीं माना जा सकता।

कर्मचारी द्वारा विभिन्न सरकारी और नियामक संस्थाओं को भेजी गई शिकायतों पर भी अदालत ने विचार किया।

न्यायालय ने कहा कि किसी कर्मचारी को अपनी सेवा संबंधी शिकायतें उठाने का अधिकार है। लेकिन यदि शिकायतें संस्था के बाहर कई प्राधिकरणों को भेजी जाती हैं और उनमें संस्थान के कामकाज पर आरोप लगाए जाते हैं, तो यह पूरी तरह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा आचरण कभी भी कदाचार नहीं होगा।

अदालत ने कहा,

“केवल यह कहना कि विभिन्न प्राधिकरणों को शिकायत भेजना किसी भी परिस्थिति में कदाचार नहीं हो सकता, सही दृष्टिकोण नहीं है।”

हाईकोर्ट ने लेबर कोर्ट के 1 सितंबर 2023 के आदेश और इंडस्ट्रियल कोर्ट के 11 जून 2024 के आदेश को रद्द कर दिया।

अदालत ने माना कि विभागीय जांच अधिकारी के निष्कर्ष उपलब्ध साक्ष्यों पर आधारित थे और उन्हें “परवर्स” नहीं कहा जा सकता। हालांकि, प्रबंधक के साथ दुर्व्यवहार वाला आरोप सिद्ध नहीं माना गया।

इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि अब लेबर कोर्ट यह तय करेगा कि कर्मचारी पर लगाया गया बर्खास्तगी का दंड कानूनी रूप से उचित और कथित कदाचार की गंभीरता के अनुरूप था या नहीं।

अदालत ने लंबित मामले का निस्तारण छह महीने के भीतर करने का निर्देश भी दिया।

Case Details:

Case Title: Abhyudaya Co-operative Bank Ltd. v. Smita Virendra Patil

Case Number: Writ Petition No. 10929 of 2024

Judge: Justice Sandeep V. Marne

Decision Date: June 18, 2026

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