मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी वयस्क महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध मातृत्व के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने 23 वर्षीय महिला को 15 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि प्रजनन संबंधी निर्णय लेना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का हिस्सा है।
न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी ने यह आदेश उस याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया, जिसमें एक इंजीनियरिंग छात्र ने पुलिस द्वारा कथित उत्पीड़न का आरोप लगाया था।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि एक महिला की शिकायत के आधार पर पुलिस ने उसे थाने बुलाया और उस पर विवाह करने का दबाव बनाया। उसने अदालत से पुलिस हस्तक्षेप से संरक्षण की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान संबंधित महिला स्वयं अदालत में उपस्थित हुई और बताया कि वह गर्भवती है। महिला ने कहा कि वह याचिकाकर्ता के साथ सहमति से संबंध में थी, लेकिन बाद में उसने उससे दूरी बना ली और विवाह करने से इनकार कर दिया। महिला ने अदालत को बताया कि वह गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ता ने भी अदालत के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा कि वह महिला से विवाह करने या उसके साथ वैवाहिक जीवन बिताने के लिए तैयार नहीं है।
अदालत के निर्देश पर तिरुनेलवेली मेडिकल कॉलेज अस्पताल ने महिला की चिकित्सीय जांच की। रिपोर्ट में सामने आया कि वह लगभग 15 सप्ताह की गर्भवती है और शुरुआत में गंभीर एनीमिया से पीड़ित थी।
हालांकि, चिकित्सकीय उपचार, रक्त चढ़ाने और अन्य देखभाल के बाद उसकी स्थिति में पर्याप्त सुधार हुआ। विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने अदालत को बताया कि महिला अब चिकित्सकीय रूप से गर्भसमापन की प्रक्रिया के लिए उपयुक्त है।
न्यायमूर्ति गौरी ने कहा कि इस मामले का मूल प्रश्न महिला के अपने शरीर और भविष्य से जुड़े निर्णय लेने के अधिकार का है।
अदालत ने कहा, “कानून मातृत्व को बाध्य नहीं करता। संविधान एक महिला की सूचित पसंद और उसकी स्वायत्तता को गरिमा का अभिन्न हिस्सा मानता है।”
पीठ ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिससे यह लगे कि महिला का निर्णय किसी दबाव या मजबूरी का परिणाम है। इसके विपरीत, उसने अदालत के समक्ष स्पष्ट और स्वेच्छा से अपनी इच्छा व्यक्त की है।
अदालत ने कहा कि किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध अवांछित गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना उसकी शारीरिक स्वायत्तता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता में अनुचित हस्तक्षेप होगा।
अदालत ने महिला की याचिका स्वीकार करते हुए तिरुनेलवेली मेडिकल कॉलेज अस्पताल को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 के प्रावधानों के अनुसार गर्भसमापन की प्रक्रिया करने का निर्देश दिया।
साथ ही, अदालत ने निर्देश दिया कि प्रक्रिया के दौरान प्राप्त भ्रूण ऊतक और अन्य आवश्यक जैविक नमूनों को सुरक्षित रखा जाए और जांच अधिकारी को सौंपा जाए ताकि आवश्यक होने पर डीएनए परीक्षण और अन्य फोरेंसिक जांच कराई जा सके।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने भ्रूण की पितृत्व संबंधी किसी भी दावे या लंबित आपराधिक मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। उन सभी मुद्दों का निर्णय संबंधित अदालत उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के अनुसार करेगी।
इन्हीं निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया।
Case Details
Case Title: K. Surya v. State of Tamil Nadu & Others
Case Number: W.P.Crl.(MD) No.2497 of 2026
Judge: Justice L. Victoria Gowri
Decision Date: June 15, 2026

