तेलंगाना हाईकोर्ट ने मानव तस्करी और सेक्स वर्क से जुड़े मामलों में कानून की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी सेक्स वर्कर का ग्राहक मात्र होने के आधार पर व्यक्ति पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 370 के तहत मानव तस्करी का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। हालांकि, यदि ग्राहक को यह जानकारी हो या यह विश्वास करने का पर्याप्त कारण हो कि संबंधित महिला मानव तस्करी की शिकार है, तो उसके खिलाफ धारा 370A(2) के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
यह फैसला न्यायमूर्ति के. लक्ष्मण और न्यायमूर्ति बी.आर. मधुसूदन राव की खंडपीठ ने 9 जून 2026 को सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
अदालत के समक्ष कई आपराधिक याचिकाएं आई थीं, जिनमें याचिकाकर्ताओं को पुलिस ने सेक्स वर्करों के ग्राहक बताते हुए उनके खिलाफ अनैतिक देह व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (ITPA) तथा IPC की धाराओं 370 और 370A(2) के तहत मामले दर्ज किए थे।
सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा कि क्या किसी सेक्स वर्कर के ग्राहक को मानव तस्करी या तस्करी से जुड़े शोषण के अपराधों के लिए अभियोजित किया जा सकता है। विभिन्न एकल पीठों के फैसलों में अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आने के कारण यह मामला बड़ी पीठ को भेजा गया था।
धारा 370 पर अदालत की टिप्पणी
खंडपीठ ने कहा कि धारा 370 का उद्देश्य मानव तस्करी करने वालों को दंडित करना है, न कि उन व्यक्तियों को जो केवल ग्राहक के रूप में सेक्स वर्कर की सेवाएं लेते हैं।
अदालत ने कहा, “जो व्यक्ति केवल यौन सेवाओं के बदले भुगतान करता है, उसे तस्कर नहीं कहा जा सकता।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी वेश्यालय या ऐसे परिसर में जाने मात्र से व्यक्ति मानव तस्करी के अपराध का आरोपी नहीं बन जाता। अदालत के अनुसार ग्राहक और सेक्स वर्कर के बीच होने वाला सामान्य लेन-देन अपने आप में मानव तस्करी नहीं माना जा सकता।
धारा 370A(2) कब लागू होगी?
अदालत ने कहा कि धारा 370A(2) का उद्देश्य उन लोगों को दंडित करना है जो यह जानते हुए या यह मानने का कारण रखते हुए कि कोई व्यक्ति तस्करी का शिकार है, उसे यौन शोषण के लिए संलग्न करते हैं।
पीठ ने कहा कि इस प्रावधान का मकसद मानव तस्करी की मांग को बढ़ावा देने वाले अंतिम उपभोक्ता (end user) को जवाबदेह ठहराना है।
अदालत ने कहा, “ज्ञान या विश्वास करने के पर्याप्त कारण का अस्तित्व प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।”
साथ ही अदालत ने यह भी दोहराया कि स्वेच्छा से किया जाने वाला सेक्स वर्क भारतीय कानून के तहत प्रतिबंधित नहीं है। इसलिए ऐसे मामलों में कानून प्रवर्तन एजेंसियां स्वेच्छा से कार्य करने वाली सेक्स वर्करों और उनके ग्राहकों को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं कर सकतीं।
क्या केवल वेश्यालय में मौजूद होना पर्याप्त है?
तीसरे प्रश्न पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति का केवल वेश्यालय या उसके आसपास मौजूद होना धारा 370A(2) के तहत मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष को यह दिखाना होगा कि संबंधित व्यक्ति ने किसी तस्करी की शिकार महिला को यौन शोषण के उद्देश्य से संलग्न किया था और उसे इस बात की जानकारी थी या ऐसा मानने का पर्याप्त कारण था।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अभियोजन के लिए यौन शोषण की वास्तविक घटना साबित करना आवश्यक नहीं है, लेकिन व्यक्ति और कथित पीड़िता के बीच ऐसा संबंध या व्यवहार दिखाना होगा जिससे धारा 370A(2) के आवश्यक तत्व स्थापित हों।
अदालत का फैसला
तेलंगाना हाईकोर्ट ने संदर्भित प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि सेक्स वर्कर का ग्राहक IPC की धारा 370 के तहत मानव तस्करी के अपराध के लिए अभियोजित नहीं किया जा सकता।
हालांकि, यदि सेक्स वर्कर मानव तस्करी की शिकार हो और ग्राहक को इस तथ्य की जानकारी हो या ऐसा मानने का पर्याप्त कारण हो, तो उसके खिलाफ धारा 370A(2) के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल वेश्यालय के आसपास मौजूद होना अपने आप में अपराध नहीं है और ऐसे मामलों में प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।
Case Details:
Case Title: Mr. Konda Hemanth Kumar v. State of Telangana & Another (Batch Matters)
Case Number: Criminal Petition Nos. 4093, 4614, 4977, 5063 & batch matters; along with Crl. R.C. No. 935 of 2025
Bench: Justice K. Lakshman and Justice B.R. Madhusudhan Rao
Decision Date: June 9, 2026

