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जन्म प्रमाणपत्र में पिता का नाम जोड़ने का आदेश, बच्चे की पहचान और गरिमा को बताया मौलिक अधिकार: केरल हाईकोर्ट

केरल उच्च न्यायालय ने अभिभावकों को पिता का नाम जोड़ने और अपनी बेटी के जन्म प्रमाण पत्र में संशोधन करने की अनुमति दी, यह मानते हुए कि प्रक्रियात्मक बाधाएं बच्चे के पहचान और गरिमा के अधिकार को खत्म नहीं कर सकतीं।

Shivam Y.
जन्म प्रमाणपत्र में पिता का नाम जोड़ने का आदेश, बच्चे की पहचान और गरिमा को बताया मौलिक अधिकार: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक बच्ची के जन्म प्रमाणपत्र में उसके पिता का नाम जोड़ने का निर्देश देते हुए कहा कि किसी बच्चे की पहचान और गरिमा से जुड़े अधिकारों को केवल प्रक्रियागत बाधाओं के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि जब माता-पिता दोनों बच्चे की पितृत्व संबंधी पहचान को स्वीकार करते हैं, तब कानून की तकनीकी कमियां न्याय के रास्ते में नहीं आनी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिका एक ऐसे दंपति की ओर से दायर की गई थी जो विवाह से पहले रिश्ते में थे और विदेश में कार्यरत थे। इसी दौरान महिला ने आईवीएफ (IVF) प्रक्रिया के माध्यम से गर्भधारण किया था।

वर्ष 2012 में जन्मी उनकी बेटी के जन्म प्रमाणपत्र में पिता का नाम दर्ज नहीं किया गया था क्योंकि उस समय माता-पिता का विवाह नहीं हुआ था और बच्चे का पंजीकरण एकल अभिभावक (सिंगल मदर) के रूप में कराया गया था।

बाद में दोनों ने विवाह कर लिया और उनके दूसरे बच्चे का जन्म हुआ, जिसके जन्म प्रमाणपत्र में माता और पिता दोनों के नाम दर्ज हैं। परिवार न्यायालय ने भी बाद में पिता को बच्ची का जैविक पिता मानते हुए आदेश पारित किया था और दोनों माता-पिता ने सहमति जताई थी कि बच्ची के सभी आधिकारिक दस्तावेजों में पिता का नाम दर्ज किया जाए।

इसके बावजूद स्थानीय प्रशासन ने यह कहते हुए संशोधन से इनकार कर दिया कि जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसके तहत एकल अभिभावक के रूप में दर्ज जन्म रिकॉर्ड में बाद में पिता का नाम जोड़ा जा सके।

न्यायमूर्ति पी. वी. कुन्हीकृष्णन ने कहा कि मामले में बच्ची की पितृत्व पहचान को लेकर कोई विवाद नहीं है। अदालत ने पाया कि दोनों माता-पिता बच्ची को अपनी संतान के रूप में स्वीकार कर चुके हैं और रिकॉर्ड में संशोधन चाहते हैं।

अपने फैसले में अदालत ने कहा कि जन्म प्रमाणपत्र में खाली छोड़ा गया एक कॉलम महज प्रशासनिक कमी नहीं है, बल्कि यह बच्चे के लिए सामाजिक और मानसिक पीड़ा का कारण बन सकता है।

अदालत ने टिप्पणी की, “इस न्यायालय के सामने मूल प्रश्न यह है कि क्या एक तकनीकी प्रक्रिया किसी बच्चे को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त पहचान के अधिकार से वंचित कर सकती है?”

न्यायालय ने आगे कहा कि कानून का उद्देश्य जीवन की वास्तविकताओं को दर्ज करना है, न कि उन्हें नकारना। यदि किसी बच्चे की पहचान और सम्मान प्रभावित हो रहे हों तो संवैधानिक अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायालयों का कर्तव्य केवल नियमों की शब्दशः व्याख्या करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि कानून किसी निर्दोष बच्चे के लिए अन्याय का कारण न बने।

याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने स्थानीय प्राधिकरण द्वारा जारी उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके माध्यम से जन्म प्रमाणपत्र में संशोधन से इनकार किया गया था।

अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि बच्ची का संशोधित नाम जन्म रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए और उसके पिता का नाम भी जोड़ा जाए।

साथ ही, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मूल प्रविष्टि को बदले बिना रजिस्टर में हाशिये (मार्जिन) में आवश्यक प्रविष्टि की जाए और संशोधित विवरण के साथ नया जन्म प्रमाणपत्र जारी किया जाए।

अदालत ने यह पूरी प्रक्रिया 30 दिनों के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया और याचिका का निस्तारण कर दिया।

Case Details

Case Title: X & Anr. v. State of Kerala & Ors.

Case Number: WP(C) No. 25973 of 2024

Judge: Justice P.V. Kunhikrishnan

Decision Date: June 1, 2026

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