हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को नौकरी ऐसे मैट्रिक प्रमाणपत्र के आधार पर मिली है जो किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से जारी नहीं हुआ, तो उसकी सेवा समाप्त करना गलत नहीं माना जा सकता। अदालत ने इसी आधार पर एक कर्मचारी की सेवा समाप्ति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने यह स्पष्ट किया कि जब चयन प्रक्रिया में मैट्रिक परीक्षा के अंक मेरिट तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हों, तब फर्जी या गैर-मान्यता प्राप्त प्रमाणपत्र के आधार पर नियुक्ति टिक नहीं सकती।
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मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता संदीप कुमार ने वर्ष 2020 में हिमाचल प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड लिमिटेड द्वारा जारी विज्ञापन के तहत जूनियर टी-मेट (Junior T/Mate) पद के लिए आवेदन किया था। चयन प्रक्रिया में वह सफल रहा और 78.80 अंक प्राप्त कर मेरिट सूची में स्थान हासिल किया।
मार्च 2021 में उसे नियुक्ति पत्र जारी हुआ और उसने सेवा भी जॉइन कर ली।
हालांकि दस्तावेज़ सत्यापन के दौरान विभाग को उसके मैट्रिक प्रमाणपत्र में गड़बड़ी का संदेह हुआ। जांच में पता चला कि उसने जिस “Central Board of Higher Education, New Delhi” से मैट्रिक पास करने का दावा किया था, वह बोर्ड मान्यता प्राप्त नहीं है और इसे फर्जी बोर्ड के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
इसके बाद विभाग ने उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया और जवाब असंतोषजनक पाए जाने पर अप्रैल 2021 में उसकी सेवाएं समाप्त कर दीं।
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याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि उसका मैट्रिक प्रमाणपत्र वैध है और जिस बोर्ड से उसने परीक्षा पास की, उसे अवैध घोषित करने का अधिकार हिमाचल प्रदेश बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन के पास नहीं है।
वकील ने यह भी तर्क दिया कि सरकार की ओर से ऐसा कोई स्पष्ट नोटिफिकेशन नहीं था जिससे यह साबित हो कि उक्त बोर्ड फर्जी है।
साथ ही यह भी कहा गया कि उसकी नियुक्ति केवल मैट्रिक प्रमाणपत्र के आधार पर नहीं हुई थी, बल्कि तकनीकी योग्यता और अन्य मानकों के आधार पर भी उसका चयन हुआ था।
प्रतिवादियों की दलील
बिजली बोर्ड और अन्य प्रतिवादियों की ओर से कहा गया कि चयन प्रक्रिया में मैट्रिक परीक्षा के अंक बेहद महत्वपूर्ण थे। विज्ञापन के अनुसार कुल 100 अंकों की मेरिट में से 60 अंक मैट्रिक परीक्षा के अंकों के आधार पर दिए जाने थे।
सरकारी पक्ष ने यह भी बताया कि दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय ने 1999 में ही एक सार्वजनिक सूचना जारी कर चेतावनी दी थी कि कुछ निजी संस्थान 10+2 और अन्य प्रमाणपत्र जारी कर रहे हैं, जिन्हें मान्यता प्राप्त बोर्ड नहीं माना जाता।
इसी सूची में “Central Board of Higher Education” का भी नाम शामिल था।
इसके अलावा यह भी बताया गया कि दिल्ली में आधिकारिक रूप से केवल तीन बोर्ड मान्य हैं-CBSE, ICSE और NIOS।
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अदालत की टिप्पणी
अदालत ने कहा कि भर्ती विज्ञापन से साफ है कि मैट्रिक परीक्षा के अंक मेरिट तय करने में अहम भूमिका निभाते थे। इसलिए यदि मैट्रिक प्रमाणपत्र ही संदिग्ध हो, तो पूरी नियुक्ति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पीठ ने कहा: “जब किसी उम्मीदवार को ऐसे प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी मिलती है जिसकी वैधता ही संदेह के घेरे में हो, तब उस नियुक्ति को जारी नहीं रखा जा सकता।”
अदालत ने यह भी माना कि विभाग ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया था, क्योंकि कर्मचारी को पहले नोटिस दिया गया और उसका जवाब भी लिया गया।
अदालत का फैसला
सभी तथ्यों और दस्तावेज़ों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता का मैट्रिक प्रमाणपत्र ऐसे बोर्ड से जारी हुआ था जो मान्यता प्राप्त नहीं था।
अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में विभाग द्वारा सेवा समाप्ति का निर्णय गलत नहीं माना जा सकता।
इसी आधार पर अदालत ने याचिका खारिज कर दी और सेवा समाप्ति आदेश को बरकरार रखा।
Case Title: Sandeep Kumar vs Himachal Pradesh State Electricity Board Ltd. & Others
Case No.: CWP No. 2908 of 2021
Decision Date: 28 February 2026










