बेंगलुरु स्थित कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि कोई बच्चा पूरी तरह मां के साथ रह रहा है और पिता ने जिम्मेदारी नहीं निभाई है, तो बच्चे के नाम में मां का पारिवारिक सरनेम जोड़ने की अनुमति दी जा सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इससे पिता के कानूनी अधिकारों या बच्चे के उत्तराधिकार संबंधी अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
यह आदेश न्यायमूर्ति सुरज गोविंदराज ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें एक मां ने अपनी नाबालिग बेटी के जन्म प्रमाणपत्र में नाम संशोधन की मांग की थी।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला एक नाबालिग बच्ची से जुड़ा है, जिसका जन्म 16 फरवरी 2017 को बेंगलुरु के केसी जनरल हॉस्पिटल में हुआ था। बच्ची का जन्म उसके माता-पिता के लिव-इन रिलेशनशिप से हुआ था। बाद में पिता ने मां और बच्ची को छोड़ दिया और नेपाल चला गया। इसके बाद से उसका परिवार से कोई संपर्क नहीं रहा।
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जन्म के समय जारी किए गए प्रमाणपत्र में पिता का नाम दर्ज था। लेकिन बच्ची की मां, जो अब अकेले ही उसका पालन-पोषण कर रही हैं, ने जन्म प्रमाणपत्र में बेटी के नाम में अपना पारिवारिक सरनेम जोड़ने के लिए अधिकारियों से अनुरोध किया।
हालांकि, जन्म और मृत्यु पंजीकरण प्राधिकरण ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि उनके पास ऐसे बदलाव का अधिकार नहीं है। इसके बाद मां ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के प्रावधानों का विस्तृत परीक्षण किया। अदालत ने कहा कि कानून की धारा 22 रजिस्ट्रार को जन्म और मृत्यु रजिस्टर में त्रुटियों को सुधारने की शक्ति देती है।
अदालत ने यह भी कहा कि नाम किसी व्यक्ति की पहचान का अहम हिस्सा होता है और बदली परिस्थितियों में उसका संशोधन उचित हो सकता है।
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न्यायालय ने कहा:
“बच्चे की पहचान केवल जैविक तथ्य नहीं होती, बल्कि उसके सामाजिक और पारिवारिक परिवेश से भी जुड़ी होती है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे के नाम में मां का सरनेम जोड़ने से पिता का नाम जन्म प्रमाणपत्र से हटाया नहीं जाएगा और न ही इससे पिता-बच्चे के कानूनी संबंध प्रभावित होंगे।
एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी में अदालत ने कहा:
“संविधान यह अनिवार्य नहीं करता कि बच्चा हमेशा पिता का ही सरनेम रखे। मातृ पहचान भी समान रूप से मान्य है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चों से जुड़े मामलों में “best interest of the child” सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
अदालत के अनुसार बच्ची अब स्कूल जा रही है और उसके वास्तविक जीवन में इस्तेमाल होने वाले नाम और जन्म प्रमाणपत्र में दर्ज नाम के बीच अंतर होने से व्यावहारिक समस्याएं पैदा हो रही थीं।
न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में बच्चे की पहचान, सम्मान और सामाजिक सुविधा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सभी तथ्यों और तर्कों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली।
अदालत ने बेंगलुरु के मुख्य जन्म एवं मृत्यु रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि:
- नाबालिग बच्ची के जन्म प्रमाणपत्र में उसका नाम मां के पारिवारिक सरनेम के साथ संशोधित किया जाए।
- संशोधित विवरण के साथ नया जन्म प्रमाणपत्र जारी किया जाए।
- नया प्रमाणपत्र जारी करने से पहले मां को एक इंडेम्निटी बॉन्ड जमा करना होगा।
- पूरी प्रक्रिया चार सप्ताह के भीतर पूरी की जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश से बच्ची के पिता के साथ उसका जैविक संबंध या उसके उत्तराधिकार, भरण-पोषण जैसे कानूनी अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।
Case Title: X vs Chief Registrar of Births and Deaths & Another
Case Number: Writ Petition No. 33465 of 2025 (LB-BMP)
Date of Judgment: 17 February 2026









