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कर्नाटक उच्च न्यायालय ने धारा 33C(1) के तहत औपचारिक आवेदन के बिना विलंब माफी को बरकरार रखा।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने पेंशन विवाद में देरी को तकनीकी आधार पर खारिज करने से इनकार किया, और कर्मचारियों के दावे को merits पर सुनने का निर्देश दिया। - बॉश लिमिटेड का प्रबंधन बनाम पूर्व कर्मचारी और अन्य

Shivam Y.
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने धारा 33C(1) के तहत औपचारिक आवेदन के बिना विलंब माफी को बरकरार रखा।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ किया है कि केवल तकनीकी आधार पर देरी (delay) को लेकर कर्मचारियों के वैध दावों को खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि देरी के लिए उचित कारण दिए गए हैं, तो मामले को merits पर सुना जाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला Bosch Ltd. के प्रबंधन और उसके पूर्व कर्मचारियों के बीच पेंशन भुगतान को लेकर था। कर्मचारियों ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 33C(1) के तहत अपने बकाया पेंशन की मांग की थी।

कंपनी ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि आवेदन समय-सीमा (limitation) के बाहर दाखिल किया गया है। कंपनी के अनुसार, कानून के तहत ऐसे दावे एक वर्ष के भीतर किए जाने चाहिए, जबकि कुछ मामलों में देरी 6 से 26 साल तक की थी।

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न्यायमूर्ति अनंत रामनाथ हेगड़े की पीठ ने इस विवाद के दो अहम सवालों पर विचार किया-

  1. क्या देरी माफी (condonation of delay) के लिए अलग से आवेदन जरूरी है?
  2. क्या कर्मचारियों ने देरी के लिए पर्याप्त कारण बताए हैं?

अदालत ने कानून की व्याख्या करते हुए कहा कि धारा 33C(1) के तहत अलग से देरी माफी आवेदन अनिवार्य नहीं है।

पीठ ने स्पष्ट किया:

“यदि आवेदन में ही देरी के पर्याप्त कारण बताए गए हैं, तो केवल अलग आवेदन न होने के आधार पर दावा खारिज नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने यह भी माना कि पेंशन से जुड़े दावे ‘recurring cause’ यानी बार-बार उत्पन्न होने वाले अधिकार होते हैं, इसलिए उन्हें केवल तकनीकी आधार पर रोका नहीं जा सकता।

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साथ ही, रिकॉर्ड में यह भी पाया गया कि कर्मचारी वर्षों से अपने दावे के लिए कंपनी से संपर्क करते रहे थे और संबंधित दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए थे।

अदालत ने कहा कि:

  • कानून का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि केवल तकनीकी खामियों पर मामलों को खत्म करना।
  • जहां “form और substance” में टकराव हो, वहां “substance” यानी वास्तविक न्याय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • यदि कर्मचारी वैध कारण बताते हैं और साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं, तो देरी को माफ किया जा सकता है।

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पीठ ने यह भी कहा:

“केवल तकनीकी आधार पर पेंशन जैसे अधिकारों को नकारना अन्यायपूर्ण होगा।”

अदालत ने कंपनी की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि श्रम प्राधिकरण द्वारा देरी माफ करने का फैसला गलत या मनमाना नहीं है।

न्यायालय ने आदेश दिया:

  • याचिका खारिज की जाती है।
  • श्रम प्राधिकरण अब मामले को merits पर आगे बढ़ाए।
  • अदालत ने मामले के मूल दावे (merits) पर कोई राय नहीं दी है।

Case Details

Case Title: Management of Bosch Ltd. vs Former Employees & Others

Case Number: W.P. No. 6976 of 2019

Judge: Justice Anant Ramanath Hegde

Decision Date: 02 April 2026

Counsels:

  • For Petitioner: Senior Counsel K. Kasturi
  • For Respondents: Senior Counsel Suresh S. Lokre & others

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