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माफी को हमेशा के लिए नकारा नहीं जा सकता: दिल्ली उच्च न्यायालय ने लंबी कैद के बाद रिहाई का आदेश दिया

दिल्ली हाईकोर्ट ने 22 साल जेल में रहने के बाद एक उम्रकैद कैदी की समयपूर्व रिहाई मंजूर की, SRB के बार-बार अस्वीकृति आदेशों को मनमाना बताया। - रजब अली @ बब्लू बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली)

Shivam Y.
माफी को हमेशा के लिए नकारा नहीं जा सकता: दिल्ली उच्च न्यायालय ने लंबी कैद के बाद रिहाई का आदेश दिया

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में लंबे समय से जेल में बंद एक उम्रकैद कैदी को बड़ी राहत दी है। अदालत ने पाया कि बार-बार उसकी समयपूर्व रिहाई (premature release) को ठुकराने का तरीका उचित नहीं था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला रजब अली @बबलू बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) से जुड़ा है। याचिकाकर्ता को वर्ष 2005 में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दोषी ठहराया गया था और उम्रकैद की सजा दी गई थी।

रिकॉर्ड के अनुसार, वह जनवरी 2003 से हिरासत में है और लगभग 22 वर्ष से अधिक का वास्तविक कारावास काट चुका है, जबकि रिमिशन (remission) सहित कुल अवधि 28 वर्ष से अधिक हो चुकी है।

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याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि उसकी समयपूर्व रिहाई को बार-बार ठुकराने वाले आदेशों को रद्द किया जाए।

सजा समीक्षा बोर्ड (Sentence Review Board - SRB) ने 2016 से 2024 तक कुल 10 बार याचिकाकर्ता के मामले पर विचार किया, लेकिन हर बार उसकी रिहाई को ठुकरा दिया गया।

पृष्ठ 3 से 6 में दिए गए विवरण के अनुसार, हर बार अस्वीकृति के मुख्य कारण थे:

  • अपराध की गंभीरता
  • पुलिस का विरोध
  • समाज पर प्रभाव

हालांकि, कई बार प्रोबेशन अधिकारी और सामाजिक कल्याण विभाग ने रिहाई की सिफारिश भी की थी।

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याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि:

  • उसका जेल में व्यवहार लगातार अच्छा रहा है
  • उसे कई बार पैरोल और फर्लो मिली और उसने सभी शर्तों का पालन किया
  • उसे सेमी-ओपन और ओपन जेल में रखने योग्य माना गया
  • उसने जेल के अंदर विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं

उसने यह भी कहा कि SRB ने केवल अपराध की गंभीरता पर ध्यान दिया और उसके सुधार (reformation) को नजरअंदाज किया।

न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने स्पष्ट कहा कि:

“केवल अपराध की गंभीरता को आधार बनाकर बार-बार रिहाई से इनकार करना उचित नहीं है।”

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अदालत ने पाया कि:

  • SRB के आदेश “लगभग कॉपी-पेस्ट” थे और उनमें ठोस कारणों का अभाव था
  • याचिकाकर्ता के अच्छे आचरण और सुधार को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया
  • केवल पुलिस की आपत्ति को निर्णायक आधार बनाना नियमों के खिलाफ है

कोर्ट ने यह भी कहा कि:

“सजा का उद्देश्य बदला लेना नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास है।”

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अदालत ने माना कि:

  • याचिकाकर्ता ने लंबी सजा काट ली है
  • उसके आचरण से सुधार स्पष्ट है
  • उसके दोबारा अपराध करने की संभावना नहीं दिखती

इस आधार पर कोर्ट ने SRB की 2024 की कार्यवाही और उपराज्यपाल द्वारा स्वीकृत आदेश को “मनमाना और अनुचित” बताया।

अंततः अदालत ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को तत्काल प्रभाव से रिहा किया जाए, यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।

Case Details

Case Title: Rajab Ali @ Babloo vs State (NCT of Delhi)

Case Number: W.P. (CRL) No. 1336/2025

Judge: Justice Neena Bansal Krishna

Decision Date: 06 April 2026

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