दिल्ली हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी और बच्चों को दिया जाने वाला अंतरिम भरण-पोषण सामान्यतः आवेदन की तारीख से ही लागू होना चाहिए। अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश में संशोधन किया जिसमें भरण-पोषण 2019 से देने का निर्देश था, जबकि याचिका 2016 में दाखिल की गई थी।
न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्णा कांता शर्मा की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि लंबित न्यायिक प्रक्रिया का नुकसान आश्रित पत्नी और बच्चों को नहीं उठाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले में याचिकाकर्ता संयोगिता गुप्ता और उनकी दो बेटियों ने अपने पति/पिता अशोक कुमार गुप्ता के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग की थी।
दंपति का विवाह 27 मई 2001 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार दिल्ली में हुआ था। इस विवाह से दो बेटियों का जन्म हुआ। बाद में वैवाहिक विवाद बढ़ने पर दोनों अलग रहने लगे।
पत्नी ने अदालत को बताया कि वह गृहिणी हैं और उनके पास कोई स्वतंत्र आय नहीं है। बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा के खर्चों के लिए उन्हें रिश्तेदारों और दोस्तों से आर्थिक मदद लेनी पड़ रही थी। उनका आरोप था कि पति पर्याप्त आय होने के बावजूद उनकी देखभाल की जिम्मेदारी नहीं निभा रहे थे।
2019 में कड़कड़डूमा स्थित फैमिली कोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण के रूप में पत्नी और दोनों बेटियों को ₹5,500 प्रति माह प्रत्येक (कुल ₹16,500) देने का आदेश दिया, लेकिन इसे 1 जनवरी 2019 से लागू किया। इसी आदेश को पत्नी और बेटियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण कानून का उद्देश्य आर्थिक रूप से निर्भर पत्नी और बच्चों को असहाय स्थिति में जाने से बचाना है।
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अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आम तौर पर भरण-पोषण आवेदन की तारीख से दिया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा,
“यदि भरण-पोषण के मामलों में निर्णय में देरी होती है तो उसका नुकसान आश्रित पत्नी और बच्चों को नहीं होना चाहिए।”
अदालत ने यह भी पाया कि फैमिली कोर्ट ने यह स्पष्ट नहीं किया कि भरण-पोषण 2016 की जगह 2019 से क्यों लागू किया गया। आदेश में इस देरी के लिए कोई ठोस कारण दर्ज नहीं था।
न्यायालय ने यह भी कहा कि धारा 125 CrPC एक सामाजिक कल्याण से जुड़ा प्रावधान है जिसका उद्देश्य पत्नी और बच्चों को आर्थिक संकट से बचाना है। इसलिए इस कानून की व्याख्या भी उसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई राशि ₹5,500 प्रति माह प्रत्येक (कुल ₹16,500) को अत्यधिक नहीं कहा जा सकता और इस स्तर पर इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
हालांकि अदालत ने आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि अंतरिम भरण-पोषण याचिका दायर करने की तारीख यानी 5 मार्च 2016 से देय होगा, न कि 1 जनवरी 2019 से।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि पहले से दिए गए किसी भी भुगतान को कुल देय राशि में समायोजित किया जाएगा। इसके साथ ही याचिका का निस्तारण कर दिया गया।
Case Title:- Sanyogita Gupta & Ors. vs Ashok Kumar Gupta
Case Number:- CRL.REV.P. 520/2024 & CRL.M.A. 17787/2023
Judgment Pronounced On:- 27 February 2026
Advocates:
- For Petitioners: Mr. S. D. Windlesh, Advocate
- For Respondent: Mr. Nitin Saluja and Ms. Ishita Soni, Advocates










