केरल हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि कर्मचारी मुआवजा मामलों में आयोग “न्यायसंगत मुआवजा” देने के लिए बाध्य है, भले ही वह दावा की गई राशि से अधिक क्यों न हो। अदालत ने फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया की अपील को खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला एक हेडलोड वर्कर मोहनदास से जुड़ा है, जो 17 नवंबर 2007 को काम के दौरान घायल हो गए थे। गोदाम में चावल के बोरे लोड करते समय एक बोरा उनके पैरों पर गिर गया, जिससे दोनों पैरों की हड्डियाँ टूट गईं और स्थायी विकृति हो गई।
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उन्होंने कर्मचारी मुआवजा आयुक्त के समक्ष ₹1,17,410 का दावा किया था। हालांकि, आयुक्त ने साक्ष्यों के आधार पर ₹2,62,216 का मुआवजा 12% ब्याज के साथ देने का आदेश दिया।
नियोक्ता की ओर से यह दलील दी गई कि आयुक्त दावा राशि से अधिक मुआवजा नहीं दे सकते। लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा,
“आयुक्त का कर्तव्य है कि वह न्यायसंगत मुआवजा तय करे, भले ही वह मांगी गई राशि से अधिक हो।”
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दूसरा मुद्दा यह था कि कर्मचारी ने दुर्घटना की औपचारिक सूचना (नोटिस) नहीं दी थी, जो कानून के तहत जरूरी है।
इस पर कोर्ट ने कहा,
“यदि नियोक्ता को दुर्घटना की जानकारी पहले से है, तो नोटिस की कमी दावा खारिज करने का आधार नहीं बनती।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 की धारा 10 में दिए गए प्रावधान (proviso) मुख्य नियम को नरम बनाते हैं और कुछ स्थितियों में नोटिस की अनिवार्यता खत्म हो जाती है।
अदालत ने पाया कि दुर्घटना की जानकारी नियोक्ता को पहले से थी और आयुक्त का आदेश कानूनी रूप से सही है।
इस आधार पर केरल हाई कोर्ट ने नियोक्ता की अपील खारिज कर दी और मुआवजे का आदेश बरकरार रखा।
Case Details
Case Title: The Regional Manager, Food Corporation of India v. Mohandas
Case Number: MFA (ECC) No. 29 of 2023
Judge: Justice S. Manu
Decision Date: 31 March 2026










