इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि बिना ठोस साक्ष्य के पत्नी पर झूठा बयान देने (perjury) का आरोप नहीं लगाया जा सकता। अदालत ने पति की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने पत्नी के खिलाफ झूठे बयान देने की अनुमति मांगी थी।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला अकुल रस्तोगी बनाम शुभांगी रस्तोगी से जुड़ा है, जिसमें पति ने फैमिली कोर्ट के 6 फरवरी 2026 के आदेश को चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने पत्नी के खिलाफ झूठे बयान के आरोप में कार्रवाई की अनुमति देने से इनकार कर दिया था।
पति का आरोप था कि पत्नी ने अपने मेंटेनेंस (भरण-पोषण) के दावे में खुद को गृहिणी बताया, जबकि वह काम कर रही थी। साथ ही उसने यह भी कहा कि पत्नी के पास 20 लाख रुपये से अधिक की एफडीआर (Fixed Deposit Receipts) थी, जिसे उसने छुपाया।
न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की पीठ ने कहा कि:
“पति पर यह जिम्मेदारी थी कि वह यह साबित करे कि पत्नी नौकरी कर रही है। केवल आरोप लगाने से बात सिद्ध नहीं होती।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को नकारात्मक तथ्य (जैसे ‘मैं काम नहीं करती’) साबित करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
एफडीआर के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि ये राशि पत्नी के पिता द्वारा दी गई थी, जिन पर विवाह के बाद बेटी का भरण-पोषण करने का कोई कानूनी दायित्व नहीं है।
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पीठ ने यह भी जोड़ा,
“एफडीआर तोड़कर खर्च करना इस बात का संकेत है कि पत्नी को अपनी जरूरतों के लिए धन का उपयोग करना पड़ा, क्योंकि पति ने कोई सहायता नहीं दी।”
साथ ही अदालत ने कहा कि किसी तथ्य को छुपाना (suppression) हर स्थिति में झूठा बयान (false statement) नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि पत्नी ने जानबूझकर झूठा बयान दिया।
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इस आधार पर हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए अपील को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया।
“अपील में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है जिससे इसे स्वीकार किया जा सके,” पीठ ने कहा और मामला समाप्त कर दिया।
Case Details
Case Title: Akul Rastogi vs Shubhangi Rastogi
Case Number: First Appeal Defective No. 212 of 2026
Judge: Justice Arindam Sinha, Justice Satya Veer Singh
Decision Date: March 17, 2026










