सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि दहेज देने के आरोप केवल पत्नी और उसके परिवार के बयानों के आधार पर उनके खिलाफ आपराधिक मामला शुरू करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अदालत ने पति की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें पत्नी और उसके परिजनों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला राहुल गुप्ता बनाम थाना प्रभारी व अन्य से जुड़ा है। पति राहुल गुप्ता ने दावा किया कि उसकी पत्नी और उसके परिवार ने स्वयं स्वीकार किया है कि उन्होंने दहेज दिया था, इसलिए उनके खिलाफ भी दहेज निषेध अधिनियम के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।
पत्नी द्वारा पहले ही पति और उसके परिवार के खिलाफ धारा 498A IPC और दहेज कानून के तहत FIR दर्ज कराई गई थी। इसके बाद पति ने अलग से FIR दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन मजिस्ट्रेट, सत्र न्यायालय और फिर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट-तीनों ने उसकी मांग ठुकरा दी।
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न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने सुनवाई के दौरान कानून के उद्देश्य और प्रावधानों को विस्तार से समझाया।
अदालत ने कहा,
“दहेज निषेध कानून का मकसद सामाजिक बुराई को रोकना है, और इसमें ‘दहेज देने वालों’ को हर स्थिति में आरोपी मानना उचित नहीं होगा।”
पीठ ने विशेष रूप से धारा 7(3) पर जोर देते हुए कहा कि:
“पीड़ित पक्ष (पत्नी या उसके परिवार) द्वारा दिए गए बयान, उन्हें खुद ही अभियोजन के दायरे में लाने का आधार नहीं बन सकते।”
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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कई मामलों में दहेज देने वाले लोग मजबूरी में ऐसा करते हैं, इसलिए उन्हें अपराधी की तरह नहीं देखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि:
- अगर स्वतंत्र (independent) सबूत मौजूद हों, तो अलग FIR दर्ज की जा सकती है।
- लेकिन केवल पत्नी और उसके परिवार के बयानों के आधार पर मामला बनाना कानून के खिलाफ है।
- धारा 7(3) ऐसे व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करती है, जिन्हें “पीड़ित” माना जाता है।
अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट के पुराने फैसले नीरा सिंह केस को भी गलत बताते हुए कहा कि वह धारा 7(3) को नजरअंदाज करता है और इसलिए उसका कोई मूल्य नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि पति की याचिका में कोई दम नहीं है, क्योंकि उसका पूरा मामला केवल पत्नी और उसके परिवार के बयानों पर आधारित था।
अंत में अदालत ने कहा,
“याचिका में कोई मेरिट नहीं है और इसे खारिज किया जाता है।”
इस प्रकार, अदालत ने मजिस्ट्रेट, सत्र न्यायालय और हाई कोर्ट के आदेशों को बरकरार रखते हुए विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया।
Case Details
Case Title: Rahul Gupta vs. Station House Officer and Others
Case Number: SLP (Crl.) No. 13755 of 2025
Judges: Justice Sanjay Kumar and Justice K. Vinod Chandran
Decision Date: April 16, 2026









