राजस्थान हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दहेज प्रताड़ना और संबंधित आरोपों से जुड़े एक पुराने आपराधिक मामले को रद्द करते हुए कहा कि जब पति-पत्नी के बीच विवाद का समझौता हो चुका है, तलाक हो चुका है और पत्नी को ₹20 लाख की स्थायी गुजारा भत्ता राशि मिल चुकी है, तब सास-ससुर के खिलाफ आपराधिक मुकदमे को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
न्यायमूर्ति अनूप कुमार धांध ने यह आदेश सत्यपाल शर्मा एवं अन्य बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य मामले में पारित किया
मामले की पृष्ठभूमि
मामला वर्ष 2013 में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा था। शिकायतकर्ता महिला की शादी 27 नवंबर 2009 को याचिकाकर्ताओं के बेटे से हुई थी। वैवाहिक संबंधों में विवाद उत्पन्न होने के बाद महिला ने अपने पति के साथ-साथ सास-ससुर के खिलाफ भी आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी।
जांच के बाद पति और उसके माता-पिता के विरुद्ध धारा 498A, धारा 406 आईपीसी तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत आरोप पत्र पेश किया गया। वर्ष 2018 में ट्रायल कोर्ट ने आरोप भी तय कर दिए थे।
हालांकि, रिकॉर्ड से पता चला कि आरोप तय होने के बाद से शिकायतकर्ता और अन्य गवाह लंबे समय तक अदालत में साक्ष्य देने के लिए उपस्थित नहीं हुए।
इस बीच पति ने विवाह विच्छेद के लिए पारिवारिक न्यायालय में याचिका दायर की थी, जिसे 2019 में स्वीकार कर लिया गया। इसके खिलाफ पत्नी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की।
अपील की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया। समझौते के तहत पत्नी और उसकी बेटी के भरण-पोषण के लिए पति ने ₹20 लाख की एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता राशि देने पर सहमति जताई। राशि का भुगतान होने के बाद अपील का निस्तारण कर दिया गया और तलाक की डिक्री भी अंतिम रूप से जारी कर दी गई।
हाई कोर्ट ने पाया कि समझौते और गुजारा भत्ता प्राप्त करने के बावजूद शिकायतकर्ता ट्रायल कोर्ट में गवाही के लिए उपस्थित नहीं हो रही थीं।
अदालत ने कहा, “पति द्वारा समझौते की शर्तों का पालन कर दिया गया है। ऐसी स्थिति में शिकायतकर्ता को अपने पूर्व रुख से पीछे हटने और सास-ससुर के खिलाफ मुकदमा जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि अदालतों की प्रक्रिया को किसी व्यक्ति को परेशान करने के साधन में बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
फैसले में सुप्रीम कोर्ट के प्रीति गुप्ता बनाम झारखंड राज्य मामले का भी उल्लेख किया गया, जिसमें कहा गया था कि वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में अदालतों को अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए और लंबी आपराधिक कार्यवाही कई बार सभी पक्षों के लिए मानसिक पीड़ा का कारण बनती है।
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद न्यायमूर्ति धांध ने कहा कि वर्तमान मामले में पति-पत्नी के बीच विवाद का निपटारा हो चुका है, तलाक की डिक्री पारित हो चुकी है और शिकायतकर्ता को ₹20 लाख की स्थायी गुजारा भत्ता राशि भी मिल चुकी है।
अदालत ने माना कि ऐसे हालात में सास-ससुर के खिलाफ आपराधिक मुकदमे को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लंबित पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए याचिका स्वीकार कर ली।
Case Details
Case Title: Satyapal Sharma & Anr. v. State of Rajasthan & Anr.
Case Number: S.B. Criminal Miscellaneous (Petition) No. 4251/2022
Judge: Justice Anoop Kumar Dhand
Decision Date: 21 May 2026

