इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा एक धार्मिक व्यक्तित्व को दी गई अग्रिम जमानत अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के घेरे में आ गई है। यह मामला POCSO कानून के तहत दर्ज गंभीर आरोपों से जुड़ा है।
मामले की पृष्ठभूमि
प्रयागराज में एक शिविर के दौरान दो नाबालिगों से जुड़े आरोपों के आधार पर विशेष POCSO अदालत के निर्देश पर FIR दर्ज हुई थी। इसके बाद आरोपी ने अग्रिम जमानत के लिए हाई कोर्ट का रुख किया, जहां उन्हें राहत मिल गई।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में अभियोजन पक्ष की कहानी पर कुछ सवाल भी उठाए थे।
अदालत ने कहा कि पीड़ितों द्वारा घटना की जानकारी अपने अभिभावकों की बजाय एक अन्य व्यक्ति को देना सामान्य व्यवहार से अलग प्रतीत होता है।
साथ ही FIR दर्ज करने में देरी, पीड़ितों की कस्टडी और मीडिया में उनके आने जैसे पहलुओं पर भी सवाल उठाए गए।
मेडिकल साक्ष्य को लेकर भी अदालत ने स्पष्ट निष्कर्ष न होने की बात कही और पूरे घटनाक्रम को सावधानी से जांचने की आवश्यकता बताई।
शिकायतकर्ता की ओर से दायर अपील में कहा गया है कि आरोप गंभीर हैं और ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत बहुत सीमित परिस्थितियों में ही दी जानी चाहिए।
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याचिका में कहा गया है,
"उच्च न्यायालय ने जमानत के चरण में साक्ष्य संबंधी पहलुओं की जांच करके अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है।"
यह भी आशंका जताई गई कि आरोपी का प्रभाव जांच और गवाहों पर असर डाल सकता है।
अपील में यह स्पष्ट किया गया है कि मामला आरोपों की सच्चाई नहीं बल्कि POCSO जैसे विशेष कानूनों में अग्रिम जमानत देने के सिद्धांतों तक सीमित है।
अब सुप्रीम कोर्ट इस चुनौती पर सुनवाई करेगा।










