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गिफ्ट डीड वैध है, लेकिन बेटे को मां की देखभाल करनी होगी: कलकत्ता उच्च न्यायालय

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि गिफ्ट डीड में देखभाल की शर्त न होने पर उसे रद्द नहीं किया जा सकता, लेकिन माँ को रहने और भरण-पोषण का अधिकार मिलेगा। - श्रीमती निवा बसु बनाम श्री अविषेक बसु एवं अन्य।

Shivam Y.
गिफ्ट डीड वैध है, लेकिन बेटे को मां की देखभाल करनी होगी: कलकत्ता उच्च न्यायालय

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि केवल गिफ्ट डीड (उपहार विलेख) के आधार पर माता-पिता को संपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसमें देखभाल की शर्त स्पष्ट रूप से न हो। अदालत ने बेटे को निर्देश दिया कि वह अपनी माँ की गरिमा के साथ देखभाल करे और उन्हें घर में रहने दे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला श्रीमती नीवा बसु बनाम श्री अभिषेक बसु और अन्य का मामला माता-पिता द्वारा अपने बेटे को संपत्ति हस्तांतरित करने से संबंधित है। बाद में, माता ने भरण-पोषण न्यायाधिकरण में याचिका दायर कर लापरवाही का आरोप लगाया और माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत हस्तांतरण को अमान्य घोषित करने की मांग की।

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ट्रिब्यूनल ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए, उनके हिस्से की सीमा तक हस्तांतरण को अमान्य घोषित कर दिया और बेटे के परिवार को घर के उनके हिस्से को खाली करने का निर्देश दिया।

हालांकि, सिंगल जज ने इस आदेश को रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि गिफ्ट डीड में देखभाल की कोई स्पष्ट शर्त नहीं थी।

डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले सुदेश छिकारा बनाम रामती देवी का हवाला देते हुए कहा कि:

“धारा 23 लागू होने के लिए यह जरूरी है कि संपत्ति का हस्तांतरण इस शर्त पर हुआ हो कि ट्रांसफरी माता-पिता की देखभाल करेगा।”

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अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल यह लिख देना कि बेटा पहले से माता-पिता की देखभाल कर रहा था, इसे भविष्य की अनिवार्य शर्त नहीं माना जा सकता।

बेंच ने कहा:

“ऐसी कोई पूर्व-शर्त (pre-condition) इस गिफ्ट डीड में नहीं है, इसलिए इसे शून्य नहीं ठहराया जा सकता।”

अदालत ने समझाया कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 23 तभी लागू होती है जब:

  1. संपत्ति देने की शर्त में देखभाल शामिल हो
  2. और वह शर्त पूरी न की गई हो

यदि ये दोनों बातें साबित नहीं होतीं, तो गिफ्ट डीड को रद्द नहीं किया जा सकता।

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अदालत ने सिंगल जज के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन उसमें महत्वपूर्ण संशोधन किया।

बेंच ने आदेश दिया:

  • माँ को संपत्ति में रहने का अधिकार दिया जाएगा
  • बेटा उनकी देखभाल करेगा
  • उन्हें भोजन, कपड़े, दवाइयाँ और सम्मानजनक जीवन दिया जाएगा
  • हर महीने ₹2000 पॉकेट मनी दी जाएगी
  • पुलिस यह सुनिश्चित करेगी कि आदेश का पालन हो

अदालत ने कहा:

“बेटे का कर्तव्य है कि वह अपनी माँ की गरिमा के साथ देखभाल करे।”

अंत में, अपील का निपटारा कर दिया गया और कोई लागत (cost) नहीं लगाई गई।

Case Details

  • Case Title: Smt. Niva Basu vs. Sri Avishek Basu & Ors.
  • Case Number: MAT 2272 of 2025
  • Judges: Justice Shampa Sarkar, Justice Ajay Kumar Gupta
  • Decision Date: 18 March 2026

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