मुंबई में रेलवे स्टेशनों पर जूता पॉलिश का काम करने वाली एक पुरानी सहकारी संस्था को बॉम्बे हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। अदालत ने साफ किया कि इस काम पर किसी एक संस्था का एकाधिकार नहीं हो सकता और सभी योग्य संस्थाओं को बराबरी का मौका मिलना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह याचिका बॉम्बे शू-शाइन वर्कर्स को-ऑप सोसाइटी लिमिटेड द्वारा दायर की गई थी। संस्था का कहना था कि वह 1985 से रेलवे स्टेशनों पर जूता पॉलिश का काम कर रही है और 2018 की नई नीति से उसके सदस्यों की रोज़ी-रोटी खतरे में पड़ जाएगी।
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याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की थी कि
- 2018 की शू-शाइन नीति को रद्द किया जाए
- पुराने अनुभव के आधार पर लाइसेंस का नवीनीकरण किया जाए
- टेंडर प्रक्रिया को रोका जाए
डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि रेलवे द्वारा अपनाई गई ओपन टेंडर प्रणाली पारदर्शिता और समान अवसर सुनिश्चित करती है।
अदालत ने कहा:
“अगर केवल एक ही सोसायटी को काम दिया जाए, तो अन्य समान संस्थाओं के अवसर खत्म हो जाएंगे।”
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कोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता लंबे समय से यह काम कर रही है, लेकिन केवल अनुभव के आधार पर दूसरों को बाहर नहीं किया जा सकता।
एक अन्य महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा गया:
“टेंडर प्रक्रिया से पारदर्शिता आती है और इससे पक्षपात या भ्रष्टाचार की संभावना कम होती है।”
2018 की नीति में मुख्य बदलाव यह था कि:
- केवल शू-शाइन वर्कर्स की रजिस्टर्ड सोसायटी ही पात्र होगी
- ओपन टेंडर प्रक्रिया लागू होगी
- पहले जैसी SC/ST प्राथमिकता अनिवार्य नहीं रही
याचिकाकर्ता का तर्क था कि इससे नीति का सामाजिक उद्देश्य कमजोर हो गया।
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि:
- याचिकाकर्ता को कोई स्थायी या विशेष अधिकार नहीं है
- सभी सोसायटी को समान अवसर देना जरूरी है
- ओपन टेंडर प्रक्रिया वैध और उचित है
हालांकि, अदालत ने रेलवे को निर्देश दिया कि:
- अनुभवी सोसायटी को मूल्यांकन में उचित वेटेज दिया जाए
- टेंडर में न्यूनतम वेतन (Minimum Wages) का पालन अनिवार्य किया जाए
अंत में कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता चाहे तो टेंडर प्रक्रिया में भाग ले सकती है, लेकिन रेलवे को नीति के अनुसार आगे बढ़ने की स्वतंत्रता है।
Case Details
Case Title: Bombay Shoe-Shine Workers Co-Op. Society Ltd. v. General Manager, Central Railway & Ors.
Case Number: Writ Petition No. 1643 of 2022
Judge: Justice Bharati Dangre & Justice Manjusha Deshpande
Decision Date: 18 March 2026










