नागपुर पीठ में सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए नाबालिग बच्चे के लिए तय किए गए गुज़ारा भत्ते (maintenance) को बढ़ा दिया। अदालत ने कहा कि बच्चे का अधिकार केवल बुनियादी जरूरतों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके समुचित विकास और सम्मानजनक जीवन से भी जुड़ा है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक नाबालिग बच्चे द्वारा, उसकी मां के माध्यम से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका से जुड़ा था। परिवार न्यायालय, नागपुर ने पहले ₹15,000 प्रति माह का गुज़ारा भत्ता तय किया था।
मां और पिता दोनों ही मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े हैं। रिकॉर्ड के अनुसार, पिता एक वरिष्ठ मेडिकल अधिकारी हैं और लगभग ₹1.5 लाख प्रति माह कमाते हैं, जबकि मां की आय इससे कम है और बच्चा उसी के साथ रह रहा है।
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मां का तर्क था कि बढ़ती महंगाई, शिक्षा और अन्य खर्चों को देखते हुए यह राशि अपर्याप्त है। वहीं पिता ने दावा किया कि वह पहले से ही बच्चे के खर्चों में सहयोग करते रहे हैं।
न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के की पीठ ने स्पष्ट किया कि गुज़ारा भत्ता केवल भोजन और कपड़ों तक सीमित नहीं है।
अदालत ने कहा,
“दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 का उद्देश्य बच्चों को केवल जीवित रखना नहीं, बल्कि उन्हें सम्मानजनक जीवन और शिक्षा देना भी है।”
कोर्ट ने यह भी माना कि बच्चे के पालन-पोषण में मां का योगदान केवल आर्थिक नहीं होता, बल्कि समय, देखभाल और भावनात्मक समर्थन भी महत्वपूर्ण होता है।
पीठ ने कहा,
“बच्चे की परवरिश में मां की भूमिका को केवल पैसों में नहीं मापा जा सकता।”
साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों माता-पिता की जिम्मेदारी होती है, लेकिन पिता की आय अधिक होने पर उसका योगदान अधिक होना चाहिए।
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सभी तथ्यों और दोनों पक्षों की आय को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि परिवार न्यायालय द्वारा तय की गई ₹15,000 की राशि पर्याप्त नहीं है।
अदालत ने आदेश दिया कि:
- बच्चे के लिए गुज़ारा भत्ता बढ़ाकर ₹30,000 प्रति माह किया जाए
- यह राशि आवेदन की तारीख (07 दिसंबर 2016) से लागू होगी
- पिता को ₹10,000 मुकदमे के खर्च के रूप में भी देना होगा
इस प्रकार, आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश में संशोधन किया।
Case Details
Case Title: Mast. MPB v. Dr. PMB
Case Number: Criminal Revision Application No. 147 of 2023











