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दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 गवाहों को पेश करने के असीमित अवसर प्रदान नहीं करती है: राजस्थान उच्च न्यायालय

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि गवाहों की अनुपस्थिति में ट्रायल अनिश्चितकाल तक नहीं चल सकता और ट्रायल कोर्ट का साक्ष्य बंद करने का आदेश सही है। - चिमना राम बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य।

Shivam Y.
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 गवाहों को पेश करने के असीमित अवसर प्रदान नहीं करती है: राजस्थान उच्च न्यायालय

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में साफ किया कि यदि बार-बार प्रयासों के बावजूद गवाह उपलब्ध नहीं होते, तो अदालत को मुकदमे को अनिश्चितकाल तक लंबित रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक कथित फर्जी 10वीं की मार्कशीट से जुड़ा है, जिसे एक उम्मीदवार द्वारा वर्ष 2015 के जिला परिषद चुनाव में उपयोग करने का आरोप था। याचिकाकर्ता, जिसने FIR दर्ज करवाई थी, ने ट्रायल के दौरान दो अतिरिक्त गवाहों को बुलाने का अनुरोध किया।

ट्रायल कोर्ट ने धारा 311 CrPC के तहत यह अनुमति दी, लेकिन समन, जमानती वारंट और यहां तक कि गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बावजूद गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं हो सकी। अंततः ट्रायल कोर्ट ने 6 मार्च 2026 को इन गवाहों के साक्ष्य बंद कर दिए।

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सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का विस्तार से अध्ययन किया और पाया कि ट्रायल कोर्ट ने गवाहों को पेश कराने के लिए सभी संभव प्रयास किए थे।

अदालत ने कहा,

"एक आपराधिक मुकदमे को केवल इस आधार पर अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता कि कुछ गवाह उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं, जबकि उनके लिए बार-बार प्रयास किए जा चुके हों।”

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि यह मामला जनप्रतिनिधि (MLA) से जुड़ा था और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ऐसे मामलों का त्वरित निपटारा आवश्यक है।

न्यायालय ने कहा,

“निष्पक्ष सुनवाई में आरोपी का शीघ्र न्याय पाने का अधिकार भी शामिल है।”

इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता या सूचनाकर्ता को अभियोजन को नियंत्रित करने का पूर्ण अधिकार नहीं होता, बल्कि उसकी भूमिका केवल अभियोजक की सहायता तक सीमित होती है।

अदालत ने यह माना कि:

  • गवाहों को पेश कराने के लिए पर्याप्त और बार-बार प्रयास किए गए।
  • वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसे विकल्प भी आजमाए गए, लेकिन सफल नहीं हुए।
  • ट्रायल पहले से ही कई वर्षों से लंबित था और इसे और लंबा करना उचित नहीं था।

कोर्ट ने कहा,

“धारा 311 CrPC के तहत शक्ति का उपयोग न्याय के हित में होना चाहिए, न कि मुकदमे को अनावश्यक रूप से लंबा करने के लिए।”

अंततः राजस्थान हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट का आदेश उचित और न्यायसंगत था।

अदालत ने कहा कि आदेश में कोई अवैधता या मनमानी नहीं है और हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

इस आधार पर, याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया गया।

Case Details

Case Title: Chimna Ram vs State of Rajasthan & Anr.

Case Number: S.B. Criminal Misc. Petition No. 1969/2026

Judge: Justice Baljinder Singh Sandhu

Decision Date: 07 April 2026

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