मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया कि केवल जनजातीय (Scheduled Tribe) होने के आधार पर कोई व्यक्ति हिंदू विवाह कानून से स्वतः बाहर नहीं हो जाता। अदालत ने कहा कि यदि कोई पक्ष परंपरागत बहुविवाह (polygamy) का दावा करता है, तो उसे ठोस प्रमाण प्रस्तुत करना होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
मुन्नी बाई बनाम फूलमत पाव और अन्य का मामला भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 372 के तहत दायर उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के दावे से संबंधित था। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने मृतक से 1986 में विवाह किया था और 2013 में उनकी मृत्यु तक उनके साथ रही।
उसने यह भी कहा कि वे दोनों “पाव” जनजाति से हैं, जहां बहुविवाह की परंपरा है, इसलिए उसे भी मृतक की संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए।
Read also:- अनावश्यक मुकदमेबाजी के कारण 6 साल तक पेट्रोल पंप ठप्प रहा: सुप्रीम कोर्ट ने NGT के आदेश रद्द किए
दूसरी ओर, प्रतिवादी (पहली पत्नी) ने कहा कि वह ही मृतक की वैध पत्नी है और किसी दूसरी शादी को स्वीकार नहीं किया।
न्यायमूर्ति न्यायमूर्ति विवेक जैन ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण सवाल उठाए।
अदालत ने कहा कि:
“केवल यह कह देना कि किसी जनजाति में बहुविवाह की परंपरा है, पर्याप्त नहीं है। इसे ठोस साक्ष्यों से सिद्ध करना होगा।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:
“हिंदू विवाह अधिनियम से छूट का दावा करने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि संबंधित जनजाति आज भी अलग परंपराओं का पालन करती है।”
Read also:- भ्रष्टाचार में दोषी पुलिसकर्मी को बिना नोटिस बर्खास्त करना वैध: गुजरात हाईकोर्ट
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले लबीश्वर मांझी बनाम प्राण मांझी का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जनजातियों पर स्वतः हिंदू कानून लागू नहीं होने का दावा तभी स्वीकार होगा जब अलग सामाजिक परंपराएं प्रमाणित हों।
ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत दोनों ने पाया कि:
- याचिकाकर्ता बहुविवाह की कोई ठोस परंपरा साबित नहीं कर सकी
- केवल मौखिक दावे को पर्याप्त नहीं माना जा सकता
- मृतक की पहली शादी निर्विवाद रूप से स्थापित थी
अदालत ने कहा कि:
“जनजातीय परंपरा का हवाला कानून से बचने का साधन नहीं बन सकता, जब तक कि वह वास्तव में प्रचलित और प्रमाणित न हो।”
Read also:- चुनाव ड्यूटी में हादसा: सुप्रीम कोर्ट ने कहा राज्य देगा मुआवजा, बीमा कंपनी नहीं
अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि:
- याचिकाकर्ता बहुविवाह की वैधता सिद्ध करने में असफल रही
- उसे मृतक की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं दिया जा सकता
अंततः, हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के आदेशों में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।
“याचिका में कोई दम नहीं है, अतः इसे निरस्त किया जाता है।” - अदालत
Case Details
Case Title: Munni Bai vs Phoolmat Pav & Others
Case Number: Civil Revision No. 257 of 2026
Judge: Justice Vivek Jain
Decision Date: 16 March 2026
Counsels:
- Petitioner: Shri Surdeep Khampariya
- Respondents: Shri Kishori Lal Pandey, Shri Vijay Kumar Soni, Shri Takmeel Nasir, Shri Rajas Pohankar, Shri Rajendra Rajak









