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नाबालिग से संबंध के POCSO मामले में राहत: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा- जब पीड़िता ही नुकसान से इनकार करे, मुकदमा बेअर्थ

दिल्ली हाई कोर्ट ने POCSO केस में FIR रद्द करते हुए कहा कि जब कथित पीड़िता खुद नुकसान से इनकार करे और विवाह हो चुका हो, मुकदमा जारी रखना उचित नहीं। - हरमीत सिंह बनाम दिल्ली राज्य एवं अन्य।

Shivam Y.
नाबालिग से संबंध के POCSO मामले में राहत: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा- जब पीड़िता ही नुकसान से इनकार करे, मुकदमा बेअर्थ

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में उस मामले में FIR रद्द कर दी, जिसमें पति पर POCSO कानून के तहत गंभीर आरोप लगे थे। कोर्ट ने कहा कि जब कथित पीड़िता स्वयं कहे कि उसे कोई नुकसान नहीं हुआ, तो ऐसे मामले को आगे बढ़ाना न्याय के विपरीत होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला हरमीत सिंह बनाम राज्य (GNCT दिल्ली) से जुड़ा है। याचिकाकर्ता पर POCSO Act और BNS की धारा 64(1) के तहत FIR दर्ज हुई थी।

घटना के समय लड़की नाबालिग थी, जबकि आरोपी वयस्क। FIR तब दर्ज हुई जब लड़की ने अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया और डॉक्टरों ने कानूनी प्रक्रिया के तहत पुलिस को सूचना दी।

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रिकॉर्ड से पता चला कि दोनों ने सितंबर 2024 में विवाह किया था और अब वे अपने बच्चे के साथ एक परिवार के रूप में रह रहे हैं। लड़की ने अदालत में स्पष्ट कहा कि उसने अपनी मर्जी से शादी की और उसे कोई शिकायत नहीं है।

न्यायमूर्ति अनुप जयराम भंभानी ने इस मामले को “कानून और वास्तविक जीवन के बीच टकराव” बताया।

अदालत ने कहा:

“ऐसे मामलों में एक ‘कानूनी पीड़िता’ तो होती है, लेकिन जरूरी नहीं कि वास्तविक पीड़िता भी हो।”

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कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून नाबालिग की सहमति को मान्यता नहीं देता, लेकिन यह भी देखना जरूरी है कि क्या वास्तव में कोई नुकसान हुआ है।

“जब स्वयं कथित पीड़िता कहे कि उसे कोई हानि नहीं हुई, तो केवल तकनीकी आधार पर मुकदमा चलाना उचित नहीं होगा।”

अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि यदि ऐसे मामलों में मुकदमा जारी रखा जाए, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उसी लड़की और उसके बच्चे को होगा।

फैसले में अदालत ने विस्तार से बताया कि POCSO कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है, लेकिन कुछ मामलों में यह “वास्तविक परिस्थितियों से टकरा जाता है।”

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कोर्ट ने देशभर के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जहां दोनों पक्ष शादी कर चुके हों और साथ रह रहे हों, वहां कई अदालतें FIR रद्द कर चुकी हैं।

साथ ही, अदालत ने यह भी माना कि कुछ मामलों में ऐसे अपराधों को समझौते के आधार पर खत्म करना उचित नहीं होता, खासकर जब मामला गंभीर शोषण का हो।

इन सभी पहलुओं को देखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने FIR और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में आगे की कार्यवाही “न केवल बेकार होगी, बल्कि पीड़िता के लिए नुकसानदेह भी साबित होगी।”

Case Details

Case Title: Harmeet Singh vs State of GNCT Delhi & Anr.

Case Number: W.P.(CRL) 1985/2025

Judge: Justice Anup Jairam Bhambhani

Decision Date: 16 April 2026

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