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POCSO मामले में शंकराचार्य को अग्रिम जमानत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- आरोपों की जांच ज़रूरी, पर गिरफ्तारी से संरक्षण उचित

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने POCSO मामले में विरोधाभासों और देरी को देखते हुए शंकराचार्य से जुड़े आवेदकों को सशर्त अग्रिम जमानत दी। - स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य

Shivam Y.
POCSO मामले में शंकराचार्य को अग्रिम जमानत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- आरोपों की जांच ज़रूरी, पर गिरफ्तारी से संरक्षण उचित

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक संवेदनशील POCSO मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए शंकराचार्य से जुड़े दो आवेदकों को अग्रिम जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि मामले के तथ्यों में कई विरोधाभास हैं और बिना मेरिट पर टिप्पणी किए, गिरफ्तारी से संरक्षण देना न्यायोचित है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अग्रिम जमानत याचिका प्रयागराज के झूंसी पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता और बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण (POCSO) अधिनियम के प्रावधानों के तहत दर्ज एफआईआर संख्या 58/2026 से संबंधित है।

पीड़ितों के अभिभावक होने का दावा करने वाले शिकायतकर्ता द्वारा दायर आवेदन के आधार पर विशेष न्यायाधीश के निर्देश पर एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोपों में माघ मेला और महाकुंभ काल सहित धार्मिक सभाओं में नाबालिग लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप शामिल थे।

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दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने आरोपों को झूठा बताते हुए कहा कि पीड़ित कभी भी आश्रम में नहीं रहे और उनके बयान में कई बदलाव हैं।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान दिया:

  • शिकायत दर्ज करने में 6 दिन की देरी को अदालत ने गंभीर माना।
  • पीड़ितों का अपने अभिभावकों की बजाय एक “अजनबी” को घटना बताना अदालत को असामान्य लगा।
  • मेडिकल रिपोर्ट में कोई स्पष्ट चोट नहीं पाई गई, केवल “संभावना से इनकार नहीं” कहा गया।
  • एक पीड़ित की उम्र को लेकर भी विवाद सामने आया- रिकॉर्ड के अनुसार वह घटना के समय बालिग था।

अदालत ने कहा,

“तथ्यों में कई विरोधाभास हैं, जिन्हें सावधानी से जांचने की आवश्यकता है।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि POCSO Act की धारा 29 के तहत जो धारणा (presumption) है, वह चार्ज तय होने से पहले लागू नहीं होती।

राज्य सरकार ने यह आपत्ति उठाई कि आवेदकों ने सीधे हाईकोर्ट का रुख किया, जबकि पहले सेशन कोर्ट जाना चाहिए था।

इस पर कोर्ट ने कहा कि:

“विशेष परिस्थितियों में हाईकोर्ट सीधे अग्रिम जमानत याचिका सुन सकता है।”

क्योंकि एफआईआर विशेष न्यायाधीश के आदेश से दर्ज हुई थी, इसलिए इसे “विशेष परिस्थिति” माना गया।

सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि बिना मामले के मेरिट पर कोई अंतिम राय दिए, यह अग्रिम जमानत का उपयुक्त मामला है।

अदालत ने आदेश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में आवेदकों को ₹50,000 के निजी मुचलके और दो जमानतदारों पर रिहा किया जाए।

साथ ही कुछ शर्तें भी लगाई गईं:

  • साक्ष्यों से छेड़छाड़ नहीं करेंगे
  • गवाहों को प्रभावित नहीं करेंगे
  • जांच और ट्रायल में सहयोग करेंगे
  • देश छोड़ने से पहले अनुमति लेंगे
  • मीडिया में कोई बयान नहीं देंगे

अदालत ने स्पष्ट किया,

“यह टिप्पणियाँ केवल जमानत निर्णय तक सीमित हैं और ट्रायल को प्रभावित नहीं करेंगी।”

Case Details:

Case Title: Swami Avimukteshwaranand Saraswati vs State of U.P. & Others

Case Number: Criminal Misc. Anticipatory Bail Application No. 2198 of 2026

Judge: Justice Jitendra Kumar Sinha

Decision Date: 25 March 2026

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