नई दिल्ली में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट किया कि यदि कोई बैंक कर्मचारी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (voluntary retirement) का नोटिस देता है और तय समय में उसे अस्वीकार नहीं किया जाता, तो उसे स्वतः स्वीकार माना जाएगा।
यह मामला UCO बैंक बनाम एस.के. श्रीवास्तव से जुड़ा था, जिसमें बैंक ने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी।
मामले की पृष्ठभूमि
एस.के. श्रीवास्तव, जो UCO बैंक में मैनेजर पद पर कार्यरत थे, ने 4 अक्टूबर 2010 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का नोटिस दिया। नियमों के अनुसार, तीन महीने के भीतर बैंक को इसे स्वीकार या अस्वीकार करना था।
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इसी दौरान, बैंक को कुछ संदिग्ध लेन-देन की जानकारी मिली और 11 नवंबर 2010 को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
हालांकि, बैंक ने निर्धारित अवधि के भीतर सेवानिवृत्ति के अनुरोध को औपचारिक रूप से अस्वीकार नहीं किया। कर्मचारी ने 16 मई 2011 से काम पर आना बंद कर दिया, यह मानते हुए कि उसकी सेवानिवृत्ति प्रभावी हो चुकी है।
बाद में, मार्च 2012 में बैंक ने चार्जशीट जारी कर दी और सेवा से बर्खास्त करने की कार्रवाई की।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी की पीठ ने मामले की गहराई से जांच करते हुए कहा कि संबंधित पेंशन नियमों के अनुसार,
“यदि तीन महीने की अवधि के भीतर सेवानिवृत्ति को अस्वीकार नहीं किया जाता, तो यह स्वतः प्रभावी हो जाती है।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल कारण बताओ नोटिस जारी करना, अनुशासनात्मक कार्यवाही (disciplinary proceedings) शुरू होने के बराबर नहीं माना जा सकता।
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“कारण बताओ नोटिस अपने आप में अनुशासनात्मक कार्यवाही की शुरुआत नहीं है,” अदालत ने संकेत दिया।
साथ ही, कोर्ट ने कहा कि बैंक यह साबित करने में असफल रहा कि उसने समय सीमा के भीतर कर्मचारी की सेवानिवृत्ति को विधिवत अस्वीकार किया था।
मामले में मुख्य प्रश्न यह था कि:
- क्या तीन महीने के भीतर अस्वीकृति न होने पर सेवानिवृत्ति स्वतः लागू मानी जाएगी?
- क्या कारण बताओ नोटिस को लंबित अनुशासनात्मक कार्यवाही माना जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों प्रश्नों पर हाई कोर्ट के निष्कर्षों को सही माना।
सुप्रीम कोर्ट ने UCO बैंक द्वारा दायर दोनों अपीलों को खारिज कर दिया और हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
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अदालत ने माना कि कर्मचारी की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 16 मई 2011 से प्रभावी हो चुकी थी। इसके बाद जारी की गई चार्जशीट और बर्खास्तगी की कार्रवाई कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।
Case Title: UCO Bank & Ors. v. S.K. Shrivastava









