सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस (धारा 138, NI Act) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि प्रारंभिक चरण में ही शिकायत को खारिज करना उचित नहीं है, यदि प्रथम दृष्टया आवश्यक शर्तें पूरी हों। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में साक्ष्य का मूल्यांकन ट्रायल के दौरान होना चाहिए, न कि उससे पहले।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला रेणुका बनाम महाराष्ट्र राज्य से जुड़ा है, जिसमें ₹50 करोड़ के चेक के बाउंस होने को लेकर शिकायत दर्ज की गई थी।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसके पति के साथ संपत्ति और शेयर विवाद के समाधान के लिए एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत ₹50 करोड़ की राशि देने की बात थी।
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इस भुगतान को सुरक्षित रखने के लिए एक तीसरे व्यक्ति (दूसरे प्रतिवादी) ने मध्यस्थ के रूप में चेक जारी किया। बाद में जब चेक प्रस्तुत किया गया, तो वह “payment stopped by drawer” टिप्पणी के साथ बाउंस हो गया। इसके बाद विधिक नोटिस भेजा गया और अंततः शिकायत दायर की गई।
मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने प्रथम दृष्टया मामला बनता हुआ पाकर प्रक्रिया जारी की थी।
हालांकि, सत्र न्यायालय ने यह कहते हुए आदेश रद्द कर दिया कि चेक किसी “कानूनी रूप से देय ऋण” के लिए जारी नहीं किया गया था। हाईकोर्ट ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि:
“प्रक्रिया जारी करने के चरण पर केवल यह देखा जाना चाहिए कि चेक जारी हुआ, प्रस्तुत किया गया, बाउंस हुआ और नोटिस के बाद भुगतान नहीं हुआ।”
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अदालत ने यह भी कहा कि:
“धारा 139 के तहत जो कानूनी अनुमान (presumption) है, उसे ट्रायल से पहले खारिज नहीं किया जा सकता।”
पीठ ने जोर दिया कि यदि आरोपी यह साबित करना चाहता है कि कोई वैध देनदारी नहीं थी, तो उसे ट्रायल के दौरान साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।
अदालत ने दोहराया कि धारा 138 के मामलों में:
- चेक का जारी होना
- उसका बाउंस होना
- वैधानिक नोटिस
- समय पर शिकायत
ये चार तत्व पर्याप्त होते हैं प्रक्रिया शुरू करने के लिए।
इसके बाद, धारा 139 के तहत यह माना जाता है कि चेक किसी देनदारी के लिए जारी हुआ था-जब तक कि आरोपी इसे ट्रायल में खंडित न कर दे।
सुप्रीम कोर्ट ने सत्र न्यायालय और हाईकोर्ट दोनों के आदेशों को रद्द कर दिया।
अदालत ने कहा कि शिकायत को खारिज करना “पूरी तरह अनुचित” था, क्योंकि आरोपी ने अभी तक कोई ऐसा साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया था जिससे कानूनी अनुमान को खारिज किया जा सके।
मामले को पुनः बहाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि शिकायत पर ट्रायल के आधार पर सुनवाई की जाए।
Case Details
Case Title: Renuka vs State of Maharashtra & Anr.
Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 7829 of 2023
Judge: Justice Atul S. Chandurkar (with Justice J.K. Maheshwari)
Decision Date: April 7, 2026









