राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में दहेज मृत्यु और उत्पीड़न से जुड़े मामले में ससुराल पक्ष के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों को ट्रायल का सामना करना होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला एक महिला की शादी के करीब डेढ़ महीने बाद हुई संदिग्ध मौत से जुड़ा है। रिकॉर्ड के अनुसार, शादी 8 फरवरी 2015 को हुई थी और 24 मार्च 2015 को महिला की मृत्यु हो गई।
याचिकाकर्ताओं (सास-ससुर) ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (क्रूरता) और 304B (दहेज मृत्यु) के तहत आरोपी बनाते हुए समन जारी किया गया था।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मृतका मानसिक बीमारी (बाइपोलर डिसऑर्डर) से पीड़ित थी और इसी कारण उसने आत्महत्या की, न कि किसी दहेज उत्पीड़न के चलते।
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट में दलील दी कि:
- मृतका का इलाज मानसिक अस्पताल सहित कई डॉक्टरों से चल रहा था।
- पुलिस ने चार्जशीट केवल पति के खिलाफ दायर की थी, सास-ससुर को नहीं।
- उपलब्ध साक्ष्य उनके खिलाफ दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि धारा 319 CrPC के तहत किसी को आरोपी बनाने के लिए केवल प्रथम दृष्टया (prima facie) नहीं, बल्कि उससे अधिक मजबूत साक्ष्य होना चाहिए।
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वहीं, अभियोजन पक्ष ने इसका विरोध करते हुए कहा:
- शादी के तुरंत बाद दहेज की मांग और उत्पीड़न शुरू हो गया था।
- मृतका के माता-पिता और भाई (PW1, PW2, PW3) ने स्पष्ट बयान दिए हैं।
- एक सुसाइड नोट भी मिला, जिसमें मृतका ने ससुराल पक्ष को जिम्मेदार ठहराया।
न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढंड ने कहा कि इस स्तर पर कोर्ट को केवल यह देखना है कि क्या आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त prima facie से अधिक साक्ष्य मौजूद हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“इस चरण पर बचाव पक्ष की दलीलों का विस्तृत परीक्षण नहीं किया जा सकता, यह ट्रायल कोर्ट का विषय है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि गवाहों के बयानों में दहेज की मांग और उत्पीड़न के आरोप स्पष्ट रूप से सामने आते हैं, जो आगे की कार्यवाही के लिए पर्याप्त हैं।
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सुसाइड नोट के संबंध में कोर्ट ने कहा कि इसकी प्रमाणिकता ट्रायल के दौरान तय की जाएगी।
हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत द्वारा धारा 319 CrPC के तहत आरोपियों को समन करने का आदेश उचित है और इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
“रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद है।”
इसके साथ ही, कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। हालांकि, यह राहत दी गई कि जारी गैर-जमानती वारंट को जमानती वारंट में परिवर्तित किया जाए, यदि आरोपी निर्धारित समय सीमा में ट्रायल कोर्ट के समक्ष उपस्थित होते हैं।
Case Details
Case Title: Mangtu Ram & Anr. vs State of Rajasthan & Anr.
Case Number: S.B. Criminal Misc. Petition No. 1605/2021
Judge: Justice Anoop Kumar Dhand
Decision Date: 27 March 2026
Counsels:
- For Petitioners: Mr. A.K. Gupta (Sr. Adv.) & team
- For Respondents: Mr. Jitendra Singh Rathore (PP) & Dr. Shivendra Singh Rathore










