दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में उस आरोपी को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया, जिस पर शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप है। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया (prima facie) आरोपी के खिलाफ गंभीर आरोप और साक्ष्य मौजूद हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला FIR संख्या 586/2025 से जुड़ा है, जो दिल्ली के विजय विहार थाने में दर्ज हुई थी। शिकायतकर्ता (प्रॉसिक्यूट्रिक्स) के अनुसार, आरोपी से उसकी मुलाकात 2023 में हुई थी। दोनों के बीच दोस्ती बढ़ी और आरोपी ने शादी का प्रस्ताव रखा।
शिकायत के अनुसार, इसी वादे के आधार पर आरोपी ने उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए। बाद में जब वह गर्भवती हुई, तो आरोपी ने गर्भपात कराने की सलाह दी। बाद में उसे यह भी पता चला कि आरोपी पहले से किसी अन्य महिला के साथ संबंध में है और उसके दो बच्चे हैं।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस डॉ. स्वरणा कांता शर्मा ने रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों का विस्तार से विश्लेषण किया।
अदालत ने पाया कि जांच में यह सामने आया कि आरोपी एक महिला (जीनत परवीन) के साथ रह रहा था और उससे उसके दो बच्चे भी हैं। इसके समर्थन में फोटो, जन्म प्रमाण पत्र और अन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए गए।
अदालत ने कहा,
“प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी के वादे को लेकर ईमानदार इरादा नहीं रखा।”
Read also:- मजदूरों के बकाया भुगतान पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कंपनियों की संपत्तियों के उपयोग पर दिया अहम आदेश
व्हाट्सऐप चैट्स का हवाला देते हुए आरोपी ने दावा किया कि शिकायतकर्ता को उसकी पहले से चल रही रिलेशनशिप की जानकारी थी। लेकिन अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि इन चैट्स से यह साबित नहीं होता कि शिकायतकर्ता को आरोपी के बच्चों या उसके साथ रहने की जानकारी थी।
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि संबंध आपसी सहमति से बने थे और शादी का कोई झूठा वादा नहीं किया गया था। यह भी कहा गया कि आरोपी की पहले से शादी नहीं हुई थी, बल्कि वह सिर्फ “लिव-इन रिलेशनशिप” में था।
वहीं, राज्य और शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि आरोपी ने महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए और शादी का झूठा भरोसा देकर संबंध बनाए। यह भी बताया गया कि आरोपी ने जांच में सहयोग नहीं किया और नोटिस के बावजूद शामिल नहीं हुआ।
Read also:- सबरीमाला मामला: सुधार के नाम पर धर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने आरोपी के आचरण और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए कहा कि इस स्तर पर उसे राहत नहीं दी जा सकती।
अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा,
“आरोपी द्वारा जांच में शामिल न होना और अदालत को गुमराह करने का प्रयास, उसके पक्ष में विवेकाधीन राहत देने के लिए पर्याप्त नहीं है।”
इसके साथ ही अदालत ने अग्रिम जमानत की याचिका खारिज कर दी। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया कि इस आदेश का असर मामले के अंतिम निर्णय पर नहीं पड़ेगा।
Case Details
Case Title: Rohit vs State (NCT of Delhi) & Anr.
Case Number: BAIL APPLN. 1228/2026
Judge: Dr. Swarana Kanta Sharma
Decision Date: 07 April 2026










