गौहाटी हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत बालिग बेटे को सिर्फ पढ़ाई जारी रखने के आधार पर मेंटेनेंस नहीं दिया जा सकता। अदालत ने पत्नी द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला स्म्ती बोबी दास बनाम श्री कांतिराम दास से जुड़ा है। दोनों की शादी 1997 में हुई थी और तीन बच्चे हुए। पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने 2013 से उसे प्रताड़ित किया और बाद में मेंटेनेंस देना बंद कर दिया।
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फैमिली कोर्ट ने 2025 में पत्नी और बच्चों के लिए मेंटेनेंस तय किया, लेकिन बेटे को 18 वर्ष की आयु के बाद मेंटेनेंस देने से इनकार कर दिया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए पत्नी हाईकोर्ट पहुंची।
न्यायमूर्ति संजीव कुमार शर्मा ने धारा 125(1) CrPC का हवाला देते हुए कहा कि कानून स्पष्ट रूप से मेंटेनेंस को केवल नाबालिग बच्चों तक सीमित करता है।
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अदालत ने कहा:
“कानून में यह स्पष्ट है कि मेंटेनेंस का अधिकार बालिग होने तक ही सीमित है, सिवाय उन मामलों के जहां बच्चा शारीरिक या मानसिक अक्षमता के कारण स्वयं का पालन नहीं कर सकता।”
कोर्ट ने यह भी माना कि सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में विशेष शक्तियों (संविधान के अनुच्छेद 142) का उपयोग कर राहत दी है, लेकिन हाईकोर्ट के पास ऐसी शक्ति नहीं है।
मुख्य प्रश्न यह था कि क्या एक बालिग पुत्र, जो उच्च शिक्षा ले रहा है, धारा 125 CrPC के तहत मेंटेनेंस पाने का हकदार है।
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अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता का बेटा 2021 में ही बालिग हो चुका है और वह कानून के अनुसार मेंटेनेंस पाने का पात्र नहीं है।
“हाईकोर्ट अपने पुनरीक्षण अधिकारों का उपयोग करते हुए कानून के विपरीत आदेश नहीं दे सकता,” अदालत ने स्पष्ट किया।
इसके साथ ही, मेंटेनेंस बढ़ाने की मांग भी खारिज कर दी गई और याचिका निरस्त कर दी गई।
Case Details
Case Title: Smt. Boby Das vs Sri Kantiram Das
Case Number: Crl. Rev. P. 234/2025
Judge: Justice Sanjeev Kumar Sharma
Decision Date: 06 April 2026










