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पत्नी के चरित्र पर शक मात्र से आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं बनता: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने सजा रद्द की

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी के चरित्र पर संदेह मात्र से आत्महत्या के लिए उकसावा सिद्ध नहीं होता, और आरोपी को दोषमुक्त कर दिया। - सुनील दत्त पाठक बनाम उत्तराखंड राज्य

Shivam Y.
पत्नी के चरित्र पर शक मात्र से आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं बनता: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने सजा रद्द की

नैनीताल स्थित उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल वैवाहिक विवाद या पत्नी के चरित्र पर संदेह, अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसावे (abetment) का अपराध सिद्ध नहीं करता। अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए आरोपी की सजा को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2004 का है, जब आरोपी की पत्नी ने अपने वैवाहिक घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि पति अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह करता था और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करता था, जिसके कारण उसने यह कदम उठाया।

ट्रायल कोर्ट ने दहेज हत्या और क्रूरता (धारा 304-B और 498-A IPC) के आरोपों से आरोपी को बरी कर दिया था, लेकिन आत्महत्या के लिए उकसाने (धारा 306 IPC) का दोषी मानते हुए 7 वर्ष की सजा सुनाई थी।

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मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने विस्तार से यह जांच की कि क्या आरोपी के खिलाफ “उकसावे” (abetment) के आवश्यक तत्व सिद्ध होते हैं।

अदालत ने कहा कि:

“सिर्फ संदेह या वैवाहिक विवाद को उकसावे के बराबर नहीं माना जा सकता, जब तक कि कोई स्पष्ट और निकटतम (proximate) कार्य न हो।”

कोर्ट ने यह भी पाया कि:

  • अभियोजन के गवाहों के बयान सामान्य और अस्पष्ट थे
  • आत्महत्या से ठीक पहले किसी प्रत्यक्ष उकसावे का प्रमाण नहीं था
  • कोई सुसाइड नोट भी नहीं मिला जिसमें आरोपी को जिम्मेदार ठहराया गया हो

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न्यायालय ने कहा:

“संदेह कितना भी प्रबल क्यों न हो, वह कानूनी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।”

हाई कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 306 और 107 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि:

  • आत्महत्या के लिए उकसावे के लिए “mens rea” यानी अपराध की मानसिक मंशा जरूरी है
  • आरोपी की ओर से कोई सक्रिय कार्य (instigation या सहायता) होना चाहिए
  • आरोपी के व्यवहार और आत्महत्या के बीच सीधा और निकट संबंध होना आवश्यक है

अदालत ने कहा कि वैवाहिक जीवन में तनाव, झगड़े या संदेह आम हो सकते हैं, लेकिन इन्हें आपराधिक उकसावे के रूप में नहीं देखा जा सकता जब तक ठोस सबूत न हों।

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अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष उकसावे के आवश्यक तत्वों को साबित करने में विफल रहा।

“रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जो यह दर्शाए कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए उकसाया या सहायता की।”

इसके साथ ही हाई कोर्ट ने:

  • ट्रायल कोर्ट का निर्णय रद्द कर दिया
  • आरोपी को धारा 306 IPC के आरोप से बरी कर दिया
  • आपराधिक अपील स्वीकार कर ली

Case Details

Case Title: Sunil Dutt Pathak vs State of Uttarakhand

Case Number: Criminal Appeal No. 204 of 2011

Judge: Justice Ashish Naithani

Decision Date: 18 February 2026

Counsels:

  • For Appellant: Siddharth Sah
  • For State: Vijay Khanduri

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