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पदस्थापन का विकल्प कोई अधिकार नहीं: दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्रीय विद्यालय के शिक्षक के तबादले को बरकरार रखा

दिल्ली हाईकोर्ट ने केवीएस शिक्षिका का ट्रांसफर बरकरार रखते हुए कहा कि मेडिकल आधार पर राहत तभी मिलेगी जब नीति में निर्धारित शर्तें पूरी हों। - शालू प्रुथी बनाम केन्द्रीय विद्यालय संगठन एवं अन्य।

Shivam Y.
पदस्थापन का विकल्प कोई अधिकार नहीं: दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्रीय विद्यालय के शिक्षक के तबादले को बरकरार रखा

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में केन्द्रीय विद्यालय संगठन (KVS) की एक शिक्षिका के ट्रांसफर को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि केवल मेडिकल उपचार की जरूरत होने से कर्मचारी को पसंदीदा स्थान पर पोस्टिंग का अधिकार नहीं मिल जाता।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, शालू प्रुथी, वर्ष 2009 से केवीएस में प्राथमिक शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। पहले उन्हें दिल्ली से पुडुचेरी के कराईकल स्थानांतरित किया गया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार पुनः विकल्प मांगे गए, जिसमें उन्होंने फरीदाबाद, गाजियाबाद और नोएडा को प्राथमिकता दी।

हालांकि, रिक्तियों की कमी के चलते उन्हें बाबूगढ़ कैंट (आगरा क्षेत्र) में पोस्ट किया गया, जो उनके पहले विकल्प फरीदाबाद से लगभग 90 किलोमीटर दूर है।

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याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वह बाइपोलर अफेक्टिव डिसऑर्डर से पीड़ित हैं और उन्हें नियमित इलाज व पारिवारिक सहयोग की आवश्यकता है।

उनके वकील ने कहा:

“इस तरह की स्थिति में राज्य का दायित्व है कि वह उचित सहूलियत (reasonable accommodation) प्रदान करे।”

यह भी तर्क दिया गया कि ट्रांसफर नीति को मानवीय दृष्टिकोण से पढ़ा जाना चाहिए और कठोर तकनीकी व्याख्या से बचना चाहिए।

केवीएस ने अदालत को बताया कि ट्रांसफर पूरी तरह नीति और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार किया गया।

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संस्थान की ओर से कहा गया:

“किसी भी कर्मचारी को पसंदीदा स्थान पर पोस्टिंग का अधिकार नहीं है, विशेषकर जब रिक्तियां उपलब्ध न हों।”

साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि याचिकाकर्ता का मेडिकल प्रमाण पत्र 50% मानसिक विकलांगता की श्रेणी में नहीं आता, जो ट्रांसफर नीति में विशेष राहत के लिए आवश्यक है।

न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने कहा कि ट्रांसफर सेवा का एक सामान्य हिस्सा है और इसमें न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होता है।

अदालत ने स्पष्ट किया:

“कर्मचारी किसी विशेष स्थान पर पोस्टिंग को अधिकार के रूप में दावा नहीं कर सकता।”

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मेडिकल आधार पर राहत के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता नीति में निर्धारित ‘मानसिक विकलांगता’ की सीमा को पूरा करती हैं।

अदालत ने पाया कि ट्रिब्यूनल का आदेश न तो अवैध है और न ही मनमाना।

“हमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं दिखता,” अदालत ने कहा और याचिका को खारिज कर दिया।

इसके साथ ही सभी लंबित आवेदन भी समाप्त कर दिए गए।

Case Details

Case Title: Ms Shalu Pruthi vs Kendriya Vidyalaya Sangathan & Anr.

Case Number: W.P.(C) 3022/2026

Court: Delhi High Court

Judges: Justice Anil Kshetrapal, Justice Amit Mahajan

Decision Date: 25 March 2026

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