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सुप्रीम कोर्ट: पुराने मुकदमे छोड़कर नए रास्ते से राहत नहीं ले सकते पक्षकार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले छोड़े गए मुकदमों को बाद में दूसरे तरीके से उठाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है, और ऐसी अपील स्वीकार नहीं होगी। - शारदा सांघी एवं अन्य vs. आशा अग्रवाल और अन्य।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट: पुराने मुकदमे छोड़कर नए रास्ते से राहत नहीं ले सकते पक्षकार

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई भी पक्षकार पहले शुरू किए गए मुकदमों को अधूरा छोड़कर बाद में दूसरे माध्यम से वही राहत पाने की कोशिश नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग (abuse of process) है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद हैदराबाद की एक संपत्ति को लेकर था। अपीलकर्ताओं ने 1986 के एक एग्रीमेंट के आधार पर specific performance (अनुबंध लागू कराने) का मुकदमा दायर किया था, जिसे ट्रायल कोर्ट ने उनके पक्ष में तय किया।

बाद में, जब संपत्ति का कब्जा दिलाने की प्रक्रिया शुरू हुई, तब कुछ तीसरे पक्ष (प्रतिवादी) सामने आए। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने उसी संपत्ति के हिस्से 1990 में खरीदे थे और उनका स्वतंत्र अधिकार है।

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दिलचस्प बात यह रही कि अपीलकर्ताओं ने पहले इन बिक्री दस्तावेजों को चुनौती देने के लिए अलग से मुकदमे दायर किए थे, लेकिन वे मुकदमे उन्होंने खुद ही आगे नहीं बढ़ाए और वे default (गैर-हाजिरी) में खारिज हो गए।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि:

“किसी मुकदमे का केवल डिफॉल्ट में खारिज होना ‘res judicata’ नहीं बनता, क्योंकि उसमें merits पर फैसला नहीं होता।”

लेकिन अदालत ने साथ ही यह भी जोड़ा कि:

“जब कोई पक्षकार खुद ही अपने दावों को आगे नहीं बढ़ाता और बाद में उसी मुद्दे को दूसरे तरीके से उठाने की कोशिश करता है, तो यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”

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कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून का उद्देश्य एक ही विवाद को बार-बार उठाने से रोकना है।

“कोर्ट की प्रक्रिया का उपयोग bona fide होना चाहिए, न कि विरोधी पक्ष को परेशान करने के लिए।”

मुख्य कानूनी सिद्धांत

  • डिफॉल्ट में खारिज मुकदमा res judicata नहीं होता
  • लेकिन फिर भी, बार-बार वही मुद्दा उठाना abuse of process माना जा सकता है
  • एक बार मौका मिलने के बाद उसे छोड़ देना, बाद में उसी मुद्दे को उठाने का अधिकार खत्म कर सकता है

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सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और निचली अदालतों के अंतिम निष्कर्ष को बरकरार रखा।

अदालत ने कहा कि अपीलकर्ताओं ने पहले के मुकदमों को खुद ही आगे नहीं बढ़ाया, इसलिए अब वे execution proceedings में उसी विवाद को फिर से नहीं उठा सकते।

अंततः, कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और कहा कि:

“अपील में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।”

Case Details

Case Title: Sharada Sanghi & Ors. v. Asha Agarwal & Ors.

Case Number: Civil Appeal No. 2609 of 2013

Judges: Justice Dipankar Datta & Justice Augustine George Masih

Decision Date: March 25, 2026

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