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7 साल की देरी और कमजोर सबूत: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज केस में ससुराल पक्ष को दी राहत, FIR रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने 7 साल की देरी और कमजोर साक्ष्यों के आधार पर दहेज उत्पीड़न मामले में ससुराल पक्ष के खिलाफ FIR और आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। - चारुल शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य

Vivek G.
7 साल की देरी और कमजोर सबूत: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज केस में ससुराल पक्ष को दी राहत, FIR रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से जुड़े मामले में ससुराल पक्ष के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने पाया कि आरोपों को समर्थन देने के लिए पर्याप्त ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं थे और शिकायत दर्ज करने में लंबी देरी भी मामले को कमजोर बनाती है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला एक महिला द्वारा दर्ज कराई गई FIR से जुड़ा था, जिसमें उसने अपने पति, सास-ससुर और ननद पर दहेज की मांग, शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। आरोप था कि विवाह (2017) के बाद से ₹8.5 लाख और कार की मांग की जा रही थी।

शिकायत में यह भी कहा गया कि गर्भावस्था के दौरान मारपीट की गई, जिससे गर्भपात हुआ, और ससुर पर अनुचित व्यवहार का आरोप भी लगाया गया।

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हालांकि, यह FIR नवंबर 2023 में दर्ज हुई यानी कथित घटनाओं के लगभग सात साल बाद।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने मामले की गहराई से जांच की और कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान दिया:

  • अदालत ने पाया कि दहेज मांग और उत्पीड़न के आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया।
  • “सिर्फ सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती,” अदालत ने स्पष्ट किया।
  • शिकायत दर्ज करने में लगभग सात साल की देरी को अदालत ने गंभीर माना।
  • पीठ ने कहा, “कानून उन लोगों की मदद करता है जो अपने अधिकारों के प्रति सतर्क रहते हैं, न कि उन लोगों की जो लंबे समय तक निष्क्रिय रहते हैं।”
  • गर्भपात के आरोप के संबंध में मेडिकल रिपोर्ट में कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला, जिसके चलते धारा 313 IPC हटा दी गई।
  • ससुर के खिलाफ लगाए गए अश्लील हरकत के आरोपों को भी अदालत ने अपर्याप्त और अस्पष्ट बताया।

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अदालत ने यह भी दोहराया कि वैवाहिक विवादों में अक्सर पूरे परिवार को शामिल कर लिया जाता है, लेकिन बिना ठोस साक्ष्य के ऐसा करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हो सकता है।

अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि इतनी लंबी देरी से दर्ज शिकायत मामलों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करती है।

“बिना किसी संतोषजनक कारण के सात साल की देरी अभियोजन के मामले को कमजोर करती है,” पीठ ने कहा।

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सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि आरोप प्रथम दृष्टया अपराध साबित नहीं करते।

अदालत ने FIR संख्या 758/2023, चार्जशीट और उससे जुड़े आपराधिक मामले को सास, ससुर और ननद के खिलाफ पूरी तरह से रद्द कर दिया।

साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस फैसले का असर अन्य लंबित वैवाहिक मामलों पर नहीं पड़ेगा, जिन्हें उनके अपने तथ्यों के आधार पर तय किया जाएगा।

Case Details

Case Title: Charul Shukla vs State of U.P. & Others

Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) Nos. 555 & 609 of 2024

Judge: Justice B.V. Nagarathna, Justice Ujjal Bhuyan

Decision Date: March 25, 2026

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