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चार्ज में तकनीकी गलती पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दोबारा सुनवाई से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोप तय करने में तकनीकी कमी से ट्रायल दोबारा शुरू नहीं होगा, यदि आरोपी को आरोपों की जानकारी थी और कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ। -

Shivam Y.
चार्ज में तकनीकी गलती पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दोबारा सुनवाई से किया इनकार

नई दिल्ली में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि केवल तकनीकी खामी के आधार पर किसी आपराधिक मुकदमे को दोबारा (de novo) शुरू नहीं किया जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि इससे न्याय में वास्तविक नुकसान हुआ है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2007 में दर्ज एक गंभीर आपराधिक घटना से जुड़ा है, जिसमें भूमि विवाद के चलते फायरिंग हुई थी और एक व्यक्ति की मौत हो गई थी।

एफआईआर के बाद आरोपियों के खिलाफ IPC की गंभीर धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल हुई और मामला सत्र न्यायालय में चला।

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2009 में आरोप तय किए गए और ट्रायल आगे बढ़ा। गवाहों के बयान दर्ज हुए, जिरह हुई और मामला अंतिम चरण में पहुंच गया।

हालांकि, बाद में यह सामने आया कि प्रारंभिक आरोप-पत्र (charge) पर औपचारिक हस्ताक्षर नहीं थे। इस तकनीकी कमी को सुधारने के लिए 2024 में फिर से आरोप तय किए गए।

ट्रायल कोर्ट ने यह माना कि आरोपी पहले से आरोपों से पूरी तरह अवगत थे और ट्रायल काफी आगे बढ़ चुका था, इसलिए पुराने साक्ष्यों को ही मान्य रखते हुए केस आगे बढ़ाया जाए।

लेकिन आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि चूंकि नए सिरे से आरोप तय हुए हैं, इसलिए ट्रायल भी शुरू से होना चाहिए।

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हाईकोर्ट ने उनकी दलील मानते हुए ट्रायल को दोबारा शुरू करने का आदेश दे दिया।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि आपराधिक प्रक्रिया का उद्देश्य न्याय दिलाना है, न कि तकनीकी त्रुटियों के आधार पर पूरी प्रक्रिया को निरस्त करना।

अदालत ने कहा:

“यदि आरोपी को आरोपों की पूरी जानकारी थी और उसे अपना बचाव करने का पूरा मौका मिला, तो केवल प्रक्रिया में हुई छोटी गलती से ट्रायल अमान्य नहीं हो जाता।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि:

  • आरोपी 14 वर्षों तक ट्रायल में सक्रिय रूप से शामिल रहे
  • गवाहों से विस्तृत जिरह की गई
  • किसी भी चरण में आरोपों को लेकर आपत्ति नहीं उठाई गई

साथ ही, अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि दो महत्वपूर्ण गवाहों की मृत्यु हो चुकी है, और नए सिरे से ट्रायल होने पर अभियोजन को गंभीर नुकसान होगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने CrPC की धारा 215 और 464 का हवाला देते हुए कहा कि:

  • आरोप तय करने में त्रुटि “curable irregularity” (सुधारी जा सकने वाली गलती) हो सकती है
  • जब तक यह साबित न हो कि इससे न्याय में विफलता (failure of justice) हुई है, तब तक ट्रायल को निरस्त नहीं किया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट के आदेश को बहाल कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि:

  • ट्रायल उसी स्थिति से आगे बढ़े, जहां वह पहले था
  • मामले का शीघ्र निपटारा किया जाए

Case Details

Case Title: Sandeep Yadav v. Satish & Others

Case Number: Criminal Appeal No. 1617 of 2026

Judges: Justice R. Mahadevan, Justice Ahsanuddin Amanullah

Decision Date: March 25, 2026

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