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फेसबुक पर बंदूक की तस्वीरें एफआईआर के लिए पर्याप्त नहीं: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने बजरंग दास के खिलाफ शस्त्र अधिनियम के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है, यह मानते हुए कि सोशल मीडिया पर मौजूद तस्वीरें अकेले हथियारों के अवैध कब्जे या हस्तांतरण को साबित नहीं करती हैं। - बजरंग दास और अन्य बनाम हरियाणा राज्य और अन्य।

Shivam Y.
फेसबुक पर बंदूक की तस्वीरें एफआईआर के लिए पर्याप्त नहीं: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय

चंडीगढ़ स्थित पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में बाजरंग दास और उनके पुत्र के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया। अदालत ने पाया कि मामले में हथियार कानून के तहत अपराध के जरूरी तत्व ही मौजूद नहीं थे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई कुछ तस्वीरों से शुरू हुआ। जांच के दौरान सामने आया कि एक व्यक्ति विकास वैद ने फेसबुक पर अलग-अलग हथियारों के साथ अपनी तस्वीरें डाली थीं।

पुलिस के अनुसार, विकास वैद बाजरंग दास का ड्राइवर था और उसने दावा किया कि उसने उनके घर में रखे लाइसेंसी हथियारों के साथ तस्वीरें खींचीं। इसके बाद पुलिस ने बाजरंग दास और उनके पुत्र के खिलाफ Arms Act की धाराओं 25 और 29 के तहत FIR दर्ज कर दी।

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याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में इस FIR को चुनौती देते हुए कहा कि यह कार्रवाई राजनीतिक दुर्भावना के कारण की गई है।

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने अदालत में कहा कि:

  • उनके पास वैध लाइसेंस था, इसलिए अवैध कब्जे का आरोप नहीं बनता।
  • हथियार का कोई दुरुपयोग नहीं हुआ।
  • केवल तस्वीर खींचना “हथियार का उपयोग” नहीं माना जा सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि मामले में “mens rea” यानी अपराध की नीयत पूरी तरह गायब है।

राज्य की ओर से दलील दी गई कि:

  • अगर यह साबित हो जाए कि हथियार किसी अनधिकृत व्यक्ति के पास थे, तो लाइसेंस धारक जिम्मेदार होंगे।
  • लाइसेंस धारक की यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपने हथियार किसी और को इस्तेमाल करने न दे।

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न्यायमूर्ति सूर्या प्रताप सिंह ने मामले का विस्तृत विश्लेषण करते हुए कहा कि:

“रिकॉर्ड से यह नहीं दिखता कि याचिकाकर्ताओं ने बिना लाइसेंस हथियार रखा या कानून का उल्लंघन किया।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि:

“तस्वीरों से यह साबित नहीं होता कि हथियार वास्तव में आरोपी के कब्जे में दिए गए थे।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जांच एजेंसी ने समान परिस्थितियों में अन्य लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की, जो भेदभावपूर्ण रवैये को दर्शाता है।

अदालत ने Arms Act की धाराओं का हवाला देते हुए कहा:

  • धारा 25 तभी लागू होती है जब बिना लाइसेंस हथियार रखा जाए।
  • धारा 29 के लिए जरूरी है कि हथियार जानबूझकर किसी अनधिकृत व्यक्ति को दिया गया हो।

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इस मामले में न तो “डिलीवरी” साबित हुई और न ही कोई आपराधिक नीयत।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि:

“मामले में आरोप प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनाते और यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए FIR को याचिकाकर्ताओं के खिलाफ रद्द कर दिया।

Case Details

Case Title: Bajrang Dass & Anr. vs State of Haryana & Anr.

Case Number: CRM-M-30985-2021

Judge: Justice Surya Partap Singh

Decision Date: March 6, 2026

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