नई दिल्ली की अदालत में सुनवाई के दौरान एक गंभीर आपराधिक मामले पर अंतिम मुहर लग गई। सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी को जलाकर हत्या करने के दोषी पति की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि इस मामले में “मरणासन्न बयान (dying declaration)” भरोसेमंद और सुसंगत है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह केस शंकर से जुड़ा है, जिसे राजस्थान में अपनी पत्नी सुगना बाई की हत्या के लिए दोषी ठहराया गया था। प्रॉसिक्यूशन के अनुसार, यह घटना अक्टूबर 2012 में हुई थी, उनकी शादी के मुश्किल से एक महीने बाद।
बताया जाता है कि महिला अपने पति के शराब पीने और हिंसक व्यवहार के कारण बुरा बर्ताव झेल रही थी। घटना वाले दिन, कथित तौर पर उसे पीटा गया, केरोसिन डाला गया और उनके किराए के कमरे में आग लगा दी गई।
वह बुरी तरह जल गई और उसे हॉस्पिटल ले जाया गया, जहाँ उसका बयान दर्ज किया गया। बाद में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
बूंदी की ट्रायल कोर्ट ने शंकर को इंडियन पीनल कोड की धारा 302 (हत्या) और 342 (गलत तरीके से कैद करना) के तहत दोषी ठहराया और उसे उम्रकैद की सज़ा सुनाई। राजस्थान हाई कोर्ट ने बाद में सज़ा बरकरार रखी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से मरणासन्न बयान पर ध्यान दिया। अदालत ने कहा:
“जब कोई व्यक्ति मृत्यु के करीब होता है, तो उसके बयान को विशेष महत्व दिया जाता है, क्योंकि उस समय झूठ बोलने की संभावना कम होती है।”
बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि बयान रिकॉर्ड करने से पहले डॉक्टर द्वारा पीड़िता की मानसिक स्थिति को सही पाया गया था।
आरोपी की ओर से यह तर्क दिया गया कि बयान प्रभावित या सिखाया गया हो सकता है, लेकिन अदालत ने इसे “सिर्फ एक आरोप” मानते हुए खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा:
“रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे यह लगे कि बयान पर किसी प्रकार का दबाव या सिखावन थी।”
हालांकि कुछ गवाह अपने बयान से मुकर गए, अदालत ने माना कि मेडिकल रिपोर्ट और मरणासन्न बयान एक-दूसरे से मेल खाते हैं।
डॉक्टरों की गवाही के अनुसार, मौत का कारण जलने से हुआ संक्रमण (सेप्टीसीमिया) था, जो पीड़िता के बयान को पुष्ट करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद कहा कि निचली अदालतों द्वारा दिया गया निर्णय सही है।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“अपील में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता, इसलिए अपील खारिज की जाती है।”
इस प्रकार, आरोपी की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी गई।
Case Title:Shankar vs State of Rajasthan
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