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पटना उच्च न्यायालय ने ‘निराशा के सिद्धांत’ का हवाला देते हुए विवाह भंग किया, पारिवारिक न्यायालय के अमान्यता संबंधी फैसले को पलट दिया।

पटना हाई कोर्ट ने शादी को वैध मानते हुए, बदली परिस्थितियों के कारण “डॉक्ट्रिन ऑफ फ्रस्ट्रेशन” लागू कर विवाह को समाप्त कर दिया। - मनोज कुमार उर्फ ​​मुन्ना बनाम नीता भारती

Shivam Y.
पटना उच्च न्यायालय ने ‘निराशा के सिद्धांत’ का हवाला देते हुए विवाह भंग किया, पारिवारिक न्यायालय के अमान्यता संबंधी फैसले को पलट दिया।

पटना हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि विवाह कानूनी रूप से हुआ हो, तो उसे केवल तकनीकी आधार पर “शुरू से ही शून्य” नहीं माना जा सकता। साथ ही, अदालत ने असाधारण परिस्थितियों में “डॉक्ट्रिन ऑफ फ्रस्ट्रेशन” (अर्थात परिस्थितियों के कारण संबंध का निभाना असंभव हो जाना) लागू करते हुए विवाह को समाप्त कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मनोज कुमार उर्फ ​​मुन्ना और उनकी पत्नी नीता भारती के बीच उत्पन्न हुआ, जिनका विवाह अक्टूबर 2007 में बेगुसराय में एक विवाह अधिकारी के समक्ष विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुआ था।

पत्नी के अनुसार, दुर्व्यवहार, जाति आधारित अपमान और दहेज की मांग सहित उत्पीड़न का सामना करने से पहले वह कुछ दिनों तक अपने ससुराल में रही। बाद में उसने विशेष विवाह अधिनियम की धारा 27 के तहत तलाक के लिए अर्जी दी, जिसमें विवाह विच्छेद और स्थायी गुजारा भत्ता की मांग की गई।

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हालांकि, पारिवारिक न्यायालय ने 2018 में उनकी याचिका खारिज कर दी, यह मानते हुए कि विवाह ही कानूनी रूप से वैध नहीं था। न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अधिनियम की धारा 12 के तहत अनिवार्य शर्तें पूरी नहीं हुई थीं, और इसलिए, "तलाक का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।"

हाई कोर्ट के समक्ष अपील में पति ने तर्क दिया कि शादी विशेष विवाह अधिनियम के तहत विधिवत हुई थी और उसका प्रमाणपत्र भी जारी हुआ था।

अदालत ने रिकॉर्ड और गवाहों की गवाही का विश्लेषण करते हुए पाया कि:

  • दोनों पक्षों ने शादी को स्वीकार किया था
  • शादी का प्रमाणपत्र जारी हुआ था
  • गवाहों ने भी विवाह संपन्न होने की पुष्टि की

अदालत ने परिवार न्यायालय के फैसले पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा:

“हमने ऐसा विकृत (perverse) कानूनी विश्लेषण पहले कभी नहीं देखा।”

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

  • विशेष विवाह अधिनियम की धारा 13(2) के अनुसार विवाह प्रमाणपत्र अंतिम और निर्णायक प्रमाण होता है
  • प्रमाणपत्र जारी होने का मतलब है कि सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की गई हैं

अदालत ने कहा कि परिवार न्यायालय ने धारा 12 की गलत व्याख्या की और प्रमाणपत्र की वैधता को नजरअंदाज किया।

साथ ही, यह भी कहा गया कि पत्नी ने विवाह को शून्य घोषित करने की मांग नहीं की थी, बल्कि तलाक मांगा था-फिर भी निचली अदालत ने खुद ही विवाह को अवैध घोषित कर दिया, जो कानूनन गलत था।

सुनवाई के दौरान सामने आया कि:

  • पत्नी ने 2021 में दूसरी शादी कर ली
  • उस विवाह से एक बच्चा भी है
  • लंबे समय से दोनों अलग रह रहे थे

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अदालत ने माना कि अब पुराने विवाह को जारी रखना व्यावहारिक और नैतिक रूप से संभव नहीं है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने एक असाधारण दृष्टिकोण अपनाया और कहा:

“जब वैवाहिक संबंध का मूल आधार ही समाप्त हो जाए, तो कानून को वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए।”

अदालत ने “डॉक्ट्रिन ऑफ फ्रस्ट्रेशन” लागू करते हुए कहा कि यह विवाह अब केवल कानूनी रूप से बचा है, वास्तविक रूप से समाप्त हो चुका है।

अंततः, कोर्ट ने पति और पत्नी के बीच विवाह को भंग (dissolve) कर दिया।

Case Title: Manoj Kumar @ Munna vs. Nita Bharti

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