झारखंड हाईकोर्ट ने निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत दायर चेक बाउंस मामले में दो आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा है कि केवल “फ्रेंडली लोन” यानी दोस्ती के आधार पर दिया गया ऋण, यदि किसी कानूनी रूप से लागू करने योग्य अनुबंध पर आधारित नहीं है, तो वह स्वतः आपराधिक दायित्व नहीं बनाता।
न्यायमूर्ति राजेश कुमार ने यह फैसला 7 मई 2026 को सुनाया। अदालत शिकायतकर्ता द्वारा दायर उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें वर्ष 2008 के बरी करने के फैसले को चुनौती दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
शिकायतकर्ता का आरोप था कि जनवरी 2007 में उसने आरोपी को व्यावसायिक मदद के लिए ₹2 लाख का मित्रवत ऋण दिया था। इसमें ₹1 लाख चेक के जरिए और बाकी राशि नकद दी गई थी। बदले में आरोपी ने सुरक्षा के तौर पर दो पोस्ट-डेटेड चेक दिए।
शिकायत के अनुसार, दोनों चेक बैंक में प्रस्तुत किए जाने पर अपर्याप्त धनराशि के कारण बाउंस हो गए। इसके बाद कानूनी नोटिस भेजा गया, लेकिन भुगतान नहीं होने पर शिकायतकर्ता ने निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत मामला दायर किया।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपियों को बरी कर दिया था। इसी आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई।
हाईकोर्ट ने माना कि चेक पर हस्ताक्षर से इनकार नहीं किया गया था, लेकिन केवल इस आधार पर धारा 138 के तहत दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री यह दर्शाती है कि लेनदेन कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण नहीं था, तो चेक धारक के पक्ष में मौजूद कानूनी अनुमान समाप्त हो सकता है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले राजेश जैन बनाम अजय सिंह का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी को केवल संभावनाओं के आधार पर अपना बचाव स्थापित करना होता है। इसके बाद ऋण के अस्तित्व को साबित करने का भार शिकायतकर्ता पर आ जाता है।
न्यायालय ने कहा,
“मित्रता किसी अनुबंध के गठन के लिए प्रतिफल (consideration) नहीं हो सकती।” अदालत के अनुसार, भारतीय अनुबंध अधिनियम के तहत वैध अनुबंध बनने के लिए कानूनी रूप से मान्य प्रतिफल आवश्यक है।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता की गवाही में रकम के भुगतान को लेकर विरोधाभास थे। मुख्य परीक्षा और जिरह में दिए गए बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे।
सभी तथ्यों और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
इसी के साथ अदालत ने शिकायतकर्ता की अपील खारिज कर दी और आरोपियों के बरी होने का आदेश बरकरार रखा।
Case Details
Case Title: Md. Masudul Haque Ansari @ M.H. Ansari v. State of Jharkhand & Ors.
Case Number: Acquittal Appeal No. 10 of 2012
Judge: Justice Rajesh Kumar
Decision Date: May 7, 2026











