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झारखंड हाईकोर्ट का फैसला: DVC कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई पर आंशिक राहत, सजा बरकरार

झारखंड हाईकोर्ट ने DVC कर्मचारी पर विभागीय कार्रवाई में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए वेतन वृद्धि रोकने की सजा और निलंबन अवधि को नॉन-ड्यूटी मानने का फैसला बरकरार रखा। - गजेंद्र प्रसाद बनाम दामोदर घाटी निगम एवं अन्य।

Rajan Prajapati
झारखंड हाईकोर्ट का फैसला: DVC कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई पर आंशिक राहत, सजा बरकरार

रांची स्थित झारखंड हाईकोर्ट ने Damodar Valley Corporation (DVC) के एक कर्मचारी से जुड़े लंबे समय से चल रहे सेवा विवाद में अहम फैसला सुनाया। अदालत ने विभागीय कार्रवाई के कुछ हिस्सों को सही ठहराते हुए कर्मचारी की सजा में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया, जबकि मामले के कुछ अन्य पहलुओं पर पहले ही राहत दी जा चुकी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला L.P.A. No. 650 of 2022 के तहत दायर एक अपील से जुड़ा था। अपीलकर्ता गजेंद्र प्रसाद, जो 1995 में DVC में असिस्टेंट ऑपरेटर (इलेक्ट्रिकल) के रूप में नियुक्त हुए थे, के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की गई थी।

वर्ष 2002 में एक आपराधिक मामले के चलते उन्हें निलंबित कर दिया गया। इसके बाद 2004 में विभाग ने उन पर कई आरोप लगाए, जिनमें शादी की जानकारी छिपाना, दहेज मांगना, पत्नी को छोड़ देना और निलंबन के दौरान बिना अनुमति मुख्यालय छोड़ना शामिल था।

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इन आरोपों के आधार पर विभागीय जांच शुरू हुई, जिसमें प्रारंभिक रिपोर्ट एकतरफा (ex-parte) तैयार की गई क्योंकि कर्मचारी जांच में उपस्थित नहीं हुए।

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति रोंगोन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति दीपक रोशन की खंडपीठ ने रिकॉर्ड और पूर्व आदेशों की विस्तार से समीक्षा की।

अदालत के सामने यह भी मुद्दा था कि जांच रिपोर्ट, जो पहले पेश नहीं की गई थी, उसे अब रिकॉर्ड पर लिया जाए। इस पर कोर्ट ने कहा:

“चूंकि दंड का आधार यही जांच रिपोर्ट है, इसलिए इसके बिना मामले का सही मूल्यांकन संभव नहीं है।”

कोर्ट ने इस आधार पर इंटरलोक्यूटरी आवेदन को स्वीकार करते हुए जांच रिपोर्ट को रिकॉर्ड में शामिल करने की अनुमति दी।

इस मामले में पहले एकल न्यायाधीश ने 29 जून 2022 को फैसला दिया था। उस आदेश में कुछ आरोपों (विशेष रूप से चार्ज नंबर 1) को गलत ठहराते हुए संबंधित दंड आदेश को रद्द कर दिया गया था।

हालांकि, चार्ज नंबर 4 (निलंबन के दौरान मुख्यालय छोड़ने का आरोप) को सही माना गया और इस आधार पर दी गई सजा-एक वर्ष के लिए एक वेतन वृद्धि रोकना (बिना स्थायी प्रभाव के)-को बरकरार रखा गया।

साथ ही, निलंबन अवधि (2002 से 2007) को “नॉन-ड्यूटी” घोषित करने के फैसले को भी यथावत रखा गया।

डिवीजन बेंच ने अपील में उठाए गए मुद्दों पर विचार करते हुए पाया कि एकल न्यायाधीश द्वारा दिए गए निष्कर्ष तथ्यों और रिकॉर्ड के अनुरूप हैं।

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अदालत ने यह माना कि जहां कुछ आरोपों पर विभागीय कार्रवाई में त्रुटि पाई गई थी, वहीं चार्ज नंबर 4 के संबंध में निष्कर्ष उचित थे और उसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।

कोर्ट ने यह भी देखा कि निलंबन अवधि को “नॉन-ड्यूटी” मानने का निर्णय विभागीय नियमों के अनुसार लिया गया था और इसमें भी कोई कानूनी खामी नहीं पाई गई।

अंततः झारखंड हाईकोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए एकल न्यायाधीश के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी के खिलाफ चार्ज नंबर 4 के आधार पर दी गई सजा और निलंबन अवधि से संबंधित निर्णय वैध हैं और उन्हें बनाए रखा जाता है।

case details

Case Title: Gajendra Prasad vs. Damodar Valley Corporation & Ors.

Case Number: L.P.A. No. 650 of 2022

Judges: Hon’ble Mr. Justice Rongon Mukhopadhyay and Hon’ble Mr. Justice Deepak Roshan

Decision Date: 02 April 2026

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