नई दिल्ली में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत दायर याचिका तय समयसीमा (limitation) के भीतर होनी चाहिए। अदालत ने पाया कि इस मामले में दायर याचिका समय सीमा से बाहर थी, इसलिए उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले की शुरुआत तब हुई जब दो कंपनियों-Shrinathji Business Ventures Pvt. Ltd. और Samaria Business Ventures Pvt. Ltd.-को वर्ष 2014 में DHFL द्वारा ऋण दिया गया। बाद में कंपनियों ने भुगतान में चूक की और 6 दिसंबर 2016 को उनके खाते NPA घोषित कर दिए गए।
इसके बाद DHFL खुद दिवाला प्रक्रिया में चली गई और उसका ऋण Omkara Asset Reconstruction Pvt. Ltd. को सौंप दिया गया। नए वित्तीय लेनदार ने IBC की धारा 7 के तहत NCLT में याचिका दाखिल कर कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) शुरू करने की मांग की।
NCLT ने याचिका स्वीकार कर ली, जिसे बाद में NCLAT ने भी बरकरार रखा। इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
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सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य प्रश्न पर विचार किया-क्या याचिका समयसीमा के भीतर दायर की गई थी?
अदालत ने कहा कि:
“पीठ ने स्पष्ट किया, ‘डिफॉल्ट की तारीख से ही limitation शुरू होती है और तीन वर्ष के भीतर याचिका दायर की जानी चाहिए।"
कोर्ट ने पाया कि डिफॉल्ट 6 दिसंबर 2016 को हुआ था, और सामान्य रूप से limitation 6 दिसंबर 2019 तक समाप्त हो जाती। हालांकि कोविड-19 के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा limitation अवधि में छूट दी गई थी, फिर भी अदालत ने गणना के बाद पाया कि याचिका 23 सितंबर 2024 को दायर की गई, जो समयसीमा से काफी बाद की थी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया:
“Section 18 के तहत liability की acknowledgment तभी मान्य होती है जब वह limitation अवधि के भीतर की गई हो।”
कोर्ट ने यह माना कि बाद में की गई किसी भी स्वीकारोक्ति (acknowledgment) से पहले ही समाप्त हो चुकी limitation अवधि को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।
सीमा की गणना डिफॉल्ट की तिथि से होगी कोविड-19 की अवधि की छूट को जोड़ने के बाद भी फाइल समय से बाहर भुगतान किया गया है अनामी की स्वीकृति (पावती) उतनी ही मान्य होगी जब वह सीमा अवधि के भीतर हो आईआरपी द्वारा दावा स्वीकृति की सीमा को बढ़ाया नहीं जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में कहा:
“निम्न अदालतों द्वारा पारित आदेश टिकाऊ नहीं हैं और इन्हें निरस्त किया जाता है।”
इसके साथ ही:
- NCLT और NCLAT के आदेश रद्द कर दिए गए
- अपील स्वीकार कर ली गई
- किसी भी पक्ष पर लागत (cost) नहीं डाली गई
Case Details
Case Title: Shankar Khandelwal v. Omkara Asset Reconstruction Pvt. Ltd. & Anr.
Case Number: Civil Appeal Nos. 13158–13159 of 2025
Bench: Justice Pamidighantam Sri Narasimha and Justice Alok Aradhe
Decision Date: April 29, 2026










