दिल्ली हाईकोर्ट ने एक संपत्ति सौदे से जुड़े कथित धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के मामले में दायर याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोपों के आधार पर आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती, जब तक ठोस सबूत मौजूद न हों।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता एन.जी. देव ने आरोप लगाया कि कुछ व्यक्तियों ने उन्हें 2008 में एक प्रॉपर्टी खरीदने के लिए प्रेरित किया और लगभग ₹6 करोड़ के सौदे की बात हुई। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने करीब ₹4.39 करोड़ नकद में विभिन्न किश्तों में भुगतान किया, लेकिन बाद में आरोप लगाया कि यह रकम हड़प ली गई और उन्हें धोखा दिया गया।
इस आधार पर उन्होंने आईपीसी की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी) और अन्य धाराओं के तहत शिकायत दर्ज कराई।
मामले में सबसे पहले मजिस्ट्रेट अदालत (CMM) ने शिकायत को खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाए कि उन्होंने इतनी बड़ी रकम वास्तव में दी थी या यह राशि कहां से आई।
इसके बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कई असंगतियों की ओर इशारा किया-
- कोई लिखित एग्रीमेंट या एमओयू नहीं था
- प्रॉपर्टी के असली मालिक से संपर्क नहीं किया गया
- भुगतान नकद में किया गया, जिसका कोई ठोस प्रमाण नहीं
मामला दिल्ली हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति जस्टिस नीना बंसल कृष्णा के समक्ष आया।
अदालत ने सबसे पहले यह प्रश्न उठाया कि क्या यह याचिका स्वीकार्य है, क्योंकि पहले ही एक रिवीजन याचिका खारिज हो चुकी थी।
अदालत ने कहा,
“धारा 482 CrPC का इस्तेमाल दोबारा तथ्यों की समीक्षा के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक न्याय के हित में हस्तक्षेप जरूरी न हो।”
अदालत ने आगे कहा कि पूरा मामला “तथ्यों के पुनर्मूल्यांकन” जैसा है, जो इस स्तर पर स्वीकार्य नहीं है।
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हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के निष्कर्षों से सहमति जताई और कहा:
- इतने बड़े सौदे में बिना किसी लिखित दस्तावेज के लेन-देन “समझ से परे” है
- कथित भुगतान के समर्थन में कोई विश्वसनीय दस्तावेज नहीं है
- जो रसीदें पेश की गईं, वे साधारण कागज पर थीं और लेन-देन से स्पष्ट रूप से जुड़ी नहीं थीं
अदालत ने यह भी कहा,
“पैसे के लेन-देन को विश्वसनीय बनाने के लिए ठोस और भरोसेमंद सबूत जरूरी होते हैं।”
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता कोई ऐसा आधार नहीं दिखा पाए जिससे निचली अदालतों के आदेश में हस्तक्षेप किया जाए।
इसलिए, याचिका को खारिज कर दिया गया और सभी लंबित आवेदन भी समाप्त कर दिए गए।
Case Title: N.G. Dev vs State (NCT of Delhi) & Ors.
Case Number: CRL.M.C. 1236/2017
Judge: Neena Bansal Krishna
Decision Date: 20 April 2026











