दिल्ली हाईकोर्ट ने बहुचर्चित आपराधिक मामले में एक अहम फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश के खिलाफ दायर रिक्यूज़ल (स्वयं को मामले से अलग करने) की मांग को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि केवल “आशंका” के आधार पर न्यायाधीश को मामले से हटने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका से जुड़ा है, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों को डिस्चार्ज किए जाने को चुनौती दी गई थी।
इस बीच, कई आरोपियों जिनमें अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य शामिल हैं - ने न्यायाधीश से स्वयं को मामले से अलग करने की मांग की। उनका कहना था कि पूर्व आदेशों और टिप्पणियों से उन्हें निष्पक्ष सुनवाई को लेकर आशंका है।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि 9 मार्च 2026 के आदेश में अदालत ने बिना उनकी बात सुने कुछ “प्राइमा फेसी” (प्रथम दृष्टया) टिप्पणियां कीं, जिससे उनके मन में पक्षपात की आशंका उत्पन्न हुई।
उन्होंने यह भी कहा कि अदालत पहले भी इसी मामले से जुड़े पहलुओं पर विस्तृत टिप्पणियां कर चुकी है, जिससे यह डर है कि अदालत पहले से ही अपना मन बना चुकी है।
“हमें न्याय नहीं मिलेगा, ऐसी आशंका हमारे मन में है,” एक आवेदक ने दलील दी।
न्यायमूर्ति डॉ. स्वरणा कांता शर्मा ने विस्तृत आदेश में इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि:
“सिर्फ किसी पक्ष की असहजता या आशंका, रिक्यूज़ल का आधार नहीं बन सकती।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि:
- प्राइमा फेसी टिप्पणियां अंतिम निष्कर्ष नहीं होतीं
- अंतरिम आदेश देना न्यायिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है
- यदि हर अंतरिम आदेश के बाद जज को हटाने की मांग हो, तो न्याय व्यवस्था ठप हो जाएगी
अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई पक्ष किसी आदेश से असंतुष्ट है, तो उसका उचित उपाय उच्च अदालत में चुनौती देना है, न कि जज को हटाने की मांग करना।
अदालत ने कहा कि
“पक्षपात का परीक्षण वास्तविक और तर्कसंगत होना चाहिए, न कि कल्पनाओं या धारणाओं पर आधारित।”
न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि यदि इस तरह की मांगें स्वीकार की जाएं, तो यह “फोरम शॉपिंग” को बढ़ावा देगा जहां पक्ष अपने अनुकूल जज चुनने की कोशिश करते हैं।
अंत में, दिल्ली हाईकोर्ट ने सभी रिक्यूज़ल आवेदनों को खारिज कर दिया और कहा कि मामला उसी पीठ के समक्ष आगे सुना जाएगा।
अदालत ने दोहराया कि न्यायिक स्वतंत्रता और संस्थागत गरिमा को बनाए रखना आवश्यक है, और बिना ठोस आधार के लगाए गए आरोपों के आगे झुका नहीं जा सकता।
Case Details
Case Title: CBI v. Kuldeep Singh & Ors.
Case Number: CRL.REV.P. 134/2026
Judge: Justice Swarana Kanta Sharma
Decision Date: 20 April 2026











