मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

सास-ससुर की संपत्ति पर बहू का स्थायी वैकल्पिक आवास का अधिकार नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश में किया संशोधन

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सास-ससुर को बहू को स्थायी वैकल्पिक आवास देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, लेकिन उचित रहने की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। - परमल और अन्य बनाम राज्य और अन्य।

Shivam Y.
सास-ससुर की संपत्ति पर बहू का स्थायी वैकल्पिक आवास का अधिकार नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश में किया संशोधन

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सास-ससुर को अपनी बहू को “स्थायी वैकल्पिक आवास” उपलब्ध कराने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा कानून के तहत महिला को साझा घर (shared household) में रहने का अधिकार जरूर है, लेकिन इसका मतलब संपत्ति पर स्थायी अधिकार नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने यह फैसला वरिष्ठ नागरिक दंपति की याचिका पर सुनाया, जिन्होंने उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें अपनी बहू और पोते-पोतियों के लिए स्थायी वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता परमाल और उनकी पत्नी, जिनकी उम्र क्रमशः 76 और 73 वर्ष है, ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। उनका आरोप था कि उनके बेटे और बहू ने उनके साथ दुर्व्यवहार और मानसिक उत्पीड़न किया।

इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने बेटे और बहू को दक्षिण दिल्ली स्थित मकान खाली करने का आदेश दिया था।

Read also:- निजी अस्पताल में वर्षों से भर्ती महिला को घर ले जाने का आदेश, ₹1 करोड़ से ज्यादा बकाया बिल पर कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

हालांकि, अपील में डिविजनल कमिश्नर ने इस आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि बहू और उसके दो बच्चों, जिनमें एक विशेष आवश्यकता वाला बच्चा भी शामिल है, को समान आकार का स्थायी वैकल्पिक आवास दिया जाए।

इसी निर्देश को वरिष्ठ नागरिक दंपति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि वे संपत्ति के पूर्ण मालिक हैं और उन्हें अपने घर में शांतिपूर्वक रहने का अधिकार है। उन्होंने अदालत को बताया कि वे बहू के लिए उचित किराये के मकान की व्यवस्था करने को तैयार हैं, लेकिन कानून उन्हें स्थायी आवास देने के लिए बाध्य नहीं करता।

यह भी कहा गया कि बहू के भरण-पोषण की प्राथमिक जिम्मेदारी उसके पति की है।

वहीं, बहू की ओर से दलील दी गई कि वह दो बच्चों की देखभाल कर रही है, जिनमें एक विशेष आवश्यकता वाला बच्चा है। उसके पास आय का कोई अन्य साधन नहीं है और वह संपत्ति से मिलने वाले किराये पर निर्भर है।

अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने एस. वनिता बनाम उपायुक्त बेंगलुरु शहरी जिला और सतीश चंद्र आहूजा बनाम स्नेहा आहूजा मामलों का हवाला देते हुए कहा कि वरिष्ठ नागरिकों और बहू—दोनों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

अदालत ने कहा,

“वरिष्ठ नागरिकों को सम्मान के साथ शांतिपूर्वक रहने का अधिकार है। वहीं बहू को भी सिर पर छत मिलने का अधिकार है।”

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा अधिनियम और वरिष्ठ नागरिक अधिनियम में कहीं भी “स्थायी आवास” देने का प्रावधान नहीं है। अदालत के अनुसार, महिला को साझा घर में रहने की सुरक्षा मिल सकती है, लेकिन यह ससुराल की संपत्ति पर स्थायी अधिकार नहीं बनता।

अदालत का फैसला

हाईकोर्ट ने आदेश में संशोधन करते हुए वरिष्ठ नागरिक दंपति को निर्देश दिया कि वे बहू को साझा आवास के लिए हर महीने ₹25,000 और रखरखाव के लिए अतिरिक्त ₹5,000 दें। अदालत ने चार महीने की अग्रिम राशि 45 दिनों के भीतर जमा कराने का निर्देश भी दिया।

इसके बाद बहू और बच्चों को 45 दिनों के भीतर मकान खाली करना होगा।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि तय राशि का भुगतान नहीं किया गया, तो बहू दोबारा संपत्ति में कब्जा बहाल करने की मांग कर सकती है।

Case Details:

Case Title: Parmal & Anr. v. The State & Ors.

Case Number: W.P.(C) 15440/2024

Judge: Justice Purushaindra Kumar Kaurav

Decision Date: 12 May 2026

Mobile App

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Install App
CourtBook Mobile App

More Stories