सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पति के माता-पिता और बहन के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर रिश्तेदारों को मुकदमे में घसीटना न्यायसंगत नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला एक विवाह विवाद से जुड़ा है, जहां शिकायतकर्ता महिला ने अपने पति और ससुराल पक्ष पर दहेज उत्पीड़न और दूसरी शादी (बिगैमी) के आरोप लगाए थे।
शिकायत के अनुसार, विवाह 2007 में हुआ था और इसके बाद महिला ने आरोप लगाया कि उसे लगातार शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। आरोपों में ₹30 लाख और सोने की मांग, विदेश में मारपीट, और बाद में पति द्वारा दूसरी शादी करने का भी दावा शामिल था।
2016 में FIR दर्ज हुई और 2018 में चार्जशीट दाखिल की गई। इसके बाद ससुर, सास और ननद ने कार्यवाही रद्द कराने के लिए याचिका दायर की, जिसे केरल हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए कहा कि मुख्य आरोप पति के खिलाफ हैं, जबकि अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप “सामान्य और बिना ठोस विवरण के” हैं।
अदालत ने कहा,
“सिर्फ नाम लेना या परिवार का सदस्य होना किसी व्यक्ति को आपराधिक जिम्मेदारी में नहीं लाता, जब तक कि उसके खिलाफ स्पष्ट और विशिष्ट आरोप न हों।”
कोर्ट ने यह भी माना कि ससुराल पक्ष के खिलाफ आरोप अधिकतर “उपस्थिति” या “प्रोत्साहन” तक सीमित हैं, जिनमें किसी विशेष घटना, धमकी या प्रताड़ना का स्पष्ट विवरण नहीं है।
बिगैमी (धारा 494 IPC) के आरोपों पर अदालत ने कहा कि केवल जानकारी होना पर्याप्त नहीं है; इसमें सक्रिय भागीदारी या सहयोग का प्रमाण होना आवश्यक है।
अदालत ने यह दोहराया कि दहेज और वैवाहिक विवादों में अक्सर पूरे परिवार को शामिल कर लिया जाता है, जबकि कानून का उद्देश्य केवल वास्तविक दोषियों को सजा देना है।
कोर्ट ने कहा कि अगर आरोपों में ठोस साक्ष्य और स्पष्ट भूमिका नहीं है, तो ऐसे मामलों को जारी रखना “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए ससुर, सास और ननद के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया।
अदालत ने आदेश दिया कि FIR और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही इन आरोपियों के खिलाफ निरस्त की जाती है।
Case Details
Case Title: Sivaraman Nair & Ors. v. State of Kerala & Anr.
Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 9195 of 2025
Judge: Justice Augustine George Masih & Justice Sanjay Karol
Decision Date: April 24, 2026











