इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में पति की याचिका को खारिज करते हुए उस पर ₹15 लाख का भारी प्रतिकर (compensatory cost) लगाया है। अदालत ने कहा कि याचिका में तथ्यों को छिपाया गया और न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास किया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला रणजीत सिंह बनाम नीतू सिंह से जुड़ा है, जिसमें पति ने फैमिली कोर्ट में लंबित भरण-पोषण (maintenance) मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने की मांग की थी।
दोनों की शादी वर्ष 2019 में हुई थी। बाद में पत्नी को सरकारी नौकरी मिल गई, जबकि पति ने खुद को बेरोजगार बताते हुए भरण-पोषण की मांग की।
पति का दावा था कि वह आर्थिक रूप से कमजोर है और कई मुकदमों के कारण उसे परेशानी हो रही है। वहीं पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने उसके खाते से लिए गए लोन की रकम का दुरुपयोग किया और उसे मानसिक एवं आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि:
- पति पहले से ही ₹5,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण प्राप्त कर रहा था।
- उसने यह तथ्य छिपाया कि एक अन्य अदालत में उसे पहले ही राहत मिल चुकी है।
- जिस मेंटेनेंस केस को जल्दी निपटाने की मांग की गई थी, वह पहले से ही हाईकोर्ट द्वारा स्थगित (stay) किया जा चुका था।
अदालत ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई।
अदालत ने सख्त शब्दों में कहा:
“याचिकाकर्ता ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर और गलत शपथपत्र देकर न्यायालय से राहत पाने की कोशिश की है।”
“हाईकोर्ट ‘विंडो शॉपिंग’ का मंच नहीं है, जहां बार-बार गलत तथ्यों के आधार पर राहत मांगी जाए।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का कानून मुख्यतः पत्नी, बच्चों और माता-पिता के लिए बनाया गया है, और एक सक्षम (able-bodied) पति खुद को पूरी तरह पत्नी पर निर्भर नहीं दिखा सकता।
रिकॉर्ड के अनुसार:
- पत्नी ने दो बार बड़े लोन लिए थे, जिनकी EMI वह अभी भी चुका रही है।
- बैंक स्टेटमेंट से संकेत मिला कि बड़ी राशि पति के खातों में ट्रांसफर हुई।
- अदालत ने इसे आर्थिक शोषण (economic abuse) के रूप में देखा।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल खर्च की भरपाई नहीं, बल्कि न्यायसंगत संतुलन (equitable balance) भी जरूरी है।
अंत में अदालत ने कहा कि:
- पति की याचिका में कोई वास्तविक आधार नहीं है।
- यह याचिका “बोना फाइड” (ईमानदार) नहीं है।
अदालत ने याचिका खारिज करते हुए ₹15,00,000 का प्रतिकर पत्नी को देने का आदेश दिया।
राशि 6 सप्ताह के भीतर जमा करने का निर्देश दिया गया है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि:
- यह आदेश केवल इस याचिका तक सीमित है।
- अन्य लंबित मामलों का निर्णय संबंधित अदालतें अपने स्तर पर करेंगी।
Case Details
Case Title: Ranjeet Singh v. Neetu Singh
Case Number: Matters Under Article 227 No. 12198 of 2025
Judge: Justice Vinod Diwakar
Decision Date: April 23, 2026











