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IBC का इस्तेमाल कर्ज वसूली के लिए नहीं, डिक्री मामलों में दिवालिया प्रक्रिया अपनाने पर रोक: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि IBC का उपयोग कर्ज वसूली के लिए नहीं किया जा सकता और डिक्रीधारक को सिविल निष्पादन प्रक्रिया अपनानी चाहिए। - अंजनी टेक्नोप्लास्ट लिमिटेड बनाम शुभ गौतम

Shivam Y.
IBC का इस्तेमाल कर्ज वसूली के लिए नहीं, डिक्री मामलों में दिवालिया प्रक्रिया अपनाने पर रोक: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) का उपयोग केवल बकाया वसूली के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि किसी पक्ष के पास पहले से सिविल डिक्री मौजूद है, तो उसे उसके निष्पादन (execution) का रास्ता अपनाना चाहिए, न कि दिवालिया प्रक्रिया का।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत 2010 में दिए गए ऋण से हुई, जिसके बदले कंपनी ने चेक दिए थे, जो बाद में बाउंस हो गए। इसके बाद कई समझौते हुए और अंततः दिल्ली हाईकोर्ट ने 2018 में एक डिक्री पास की, जिसमें लगभग ₹4.38 करोड़ की राशि और ब्याज का आदेश दिया गया।

डिक्री के बाद भी भुगतान को लेकर विवाद जारी रहा। इसके बजाय, डिक्रीधारक ने सीधे IBC के तहत कार्रवाई शुरू कर दी, जिससे मामला NCLT और फिर NCLAT तक पहुंचा।

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने 2022 में याचिका खारिज करते हुए कहा था कि:

  • IBC वसूली का माध्यम नहीं है
  • कंपनी दिवालिया नहीं बल्कि चल रही और लाभ में है
  • डिक्रीधारक स्वतः “फाइनेंशियल क्रेडिटर” नहीं बन जाता

हालांकि, NCLAT ने इस आदेश को पलटते हुए IBC याचिका स्वीकार करने का निर्देश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे ने स्पष्ट शब्दों में कहा:

“IBC का मुख्य उद्देश्य कंपनी का पुनर्जीवन (revival) है, न कि व्यक्तिगत लेनदारों के लिए वसूली का साधन।”

अदालत ने आगे कहा:

“जब किसी लेनदार के पास सिविल कोर्ट की डिक्री पहले से मौजूद है, तो वह सीधे दिवालिया प्रक्रिया अपनाकर उसे लागू नहीं कर सकता।”

पीठ ने यह भी नोट किया कि कंपनी एक चलती हुई इकाई है, जिसने लाखों रुपये अदालत में जमा भी किए हैं, जिससे यह नहीं कहा जा सकता कि वह दिवालिया है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पाया कि:

  • अलग-अलग मंचों पर बकाया राशि के अलग-अलग आंकड़े पेश किए गए
  • आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) के सामने बकाया लगभग ₹96 लाख बताया गया
  • जबकि अदालत में यह दावा ₹12 करोड़ से अधिक तक पहुंच गया

अदालत ने कहा कि ऐसे विरोधाभास यह दर्शाते हैं कि बकाया राशि स्वयं विवादित है और इसे IBC के जरिए तय नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने NCLAT के आदेश को रद्द करते हुए NCLT का फैसला बहाल कर दिया।

अदालत ने कहा कि:

  • IBC प्रक्रिया इस मामले में “दुरुपयोग” के समान है
  • डिक्रीधारक को सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत निष्पादन का रास्ता अपनाना चाहिए
  • दिवालिया प्रक्रिया केवल वास्तविक वित्तीय संकट की स्थिति में ही लागू होनी चाहिए

साथ ही, अदालत ने अपीलकर्ता कंपनी के पक्ष में ₹5 लाख लागत (cost) देने का भी आदेश दिया।

Case Details

Case Title: Anjani Technoplast Ltd. vs Shubh Gautam

Case Number: Civil Appeal No. 8247 of 2022

Judge: Justice Pamidighantam Sri Narasimha, Justice Alok Aradhe

Decision Date: April 23, 2026

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